क्या आपके यहां भी सिंचाई का संकट? इन 2 ट्रिक से घट जाएगी पानी की खपत, लागत भी कम

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क्या आपके यहां भी सिंचाई का संकट? इन 2 ट्रिक से घट जाएगी पानी की खपत, लागत भी कम


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Gorakhpur News : गोरखपुर और उसके आसपास के क्षेत्रों में किसानों के सामने जल संकट बड़ी चुनौती बन चुका है. धान की बुवाई का समय आते ही भूजल स्तर नीचे चला जाता है, जबकि धान के लिए अधिक पानी की जरूरत पड़ती है. समय पर पर्याप्त सिंचाई न मिलने से फसल सूखने का खतरा भी बढ़ जाता है, लेकिन अब ऐसा नहीं होगा. लोकल 18 से गोरखपुर के कृषि एक्सपर्ट अनुपम दुबे बताते हैं कि गिरते भूजल स्तर को देखते हुए किसानों को ड्राई लैंड एग्रीकल्चर ओर ध्यान देना होगा. खेतों में नमी संरक्षण, मल्चिंग और वर्षा जल संचयन का उपयोग करके भी पानी की बचत की जा सकती है.

गोरखपुर. पूर्वांचल के कई जिलों, खासकर गोरखपुर और आसपास के क्षेत्रों में किसानों के सामने जल संकट एक बड़ी चुनौती बनकर उभरता रहा है. धान की बुवाई का समय आते ही भूजल स्तर नीचे चला जाता है, जिससे खेतों की सिंचाई करना मुश्किल हो जाता है. किसानों का कहना है कि ट्यूबवेल और बोरिंग से पानी निकालने में पहले की तुलना में अधिक समय और खर्च लगता है. कई बार पानी की कमी के कारण फसल की बढ़वार प्रभावित होती है और उत्पादन पर भी असर पड़ता है. धान की खेती में लगातार पानी की आवश्यकता होती है. ऐसे में जब भूजल स्तर नीचे चला जाता है तो किसानों को अधिक समय तक पंपिंग सेट चलाने पड़ते हैं. इससे डीजल की खपत बढ़ जाती है और खेती की लागत में इजाफा होता है. किसानों को बढ़ते खर्च के कारण आर्थिक दबाव का सामना करना पड़ता है. कुछ क्षेत्रों में समय पर पर्याप्त सिंचाई न मिलने से फसल सूखने का खतरा भी बढ़ जाता है.

और क्या बोले कृषि एक्सपर्ट

गोरखपुर स्थित दीनदयाल उपाध्याय गोरखपुर विश्वविद्यालय के कृषि विभाग के प्रोफेसर अनुपम दुबे के अनुसार, बदलते जलवायु परिदृश्य और गिरते भूजल स्तर को देखते हुए किसानों को ड्राई लैंड एग्रीकल्चर यानी कम पानी वाली खेती की ओर भी ध्यान देना चाहिए. इस तकनीक में ऐसी फसलों और कृषि पद्धतियों को अपनाया जाता है, जिनमें पानी की आवश्यकता कम होती है. खेतों में नमी संरक्षण, मल्चिंग और वर्षा जल संचयन जैसी तकनीकों का उपयोग करके पानी की बचत की जा सकती है.

पानी में पौधे

विशेषज्ञों का मानना है कि हाइड्रोपोनिक खेती भविष्य की एक महत्वपूर्ण तकनीक बन सकती है. इस पद्धति में मिट्टी की जगह पोषक तत्वों से युक्त पानी में पौधों को उगाया जाता है. पारंपरिक खेती की तुलना में इसमें काफी कम पानी की जरूरत पड़ती है और नियंत्रित वातावरण में बेहतर उत्पादन प्राप्त किया जा सकता है. सब्जियों और उच्च मूल्य वाली फसलों के लिए यह तकनीक किसानों को अतिरिक्त आय का अवसर भी प्रदान कर सकती है.

ये काम भी करना होगा

अनुपम दुबे के अनुसार, केवल नई तकनीकों को अपनाना ही पर्याप्त नहीं होगा, बल्कि जल संरक्षण को भी खेती का अभिन्न हिस्सा बनाना होगा. खेत तालाब, वर्षा जल संचयन, ड्रिप और स्प्रिंकलर सिंचाई जैसी व्यवस्थाएं भविष्य में किसानों को जल संकट से बचाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकती हैं. यदि समय रहते जल प्रबंधन पर ध्यान दिया जाए तो खेती को अधिक लाभकारी और टिकाऊ बनाया जा सकता है.

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Priyanshu Gupta

प्रियांशु गुप्‍ता बीते 10 साल से भी ज्यादा समय से पत्रकारिता में सक्रिय हैं. 2015 में भारतीय जनसंचार संस्थान (IIMC), दिल्ली से जर्नलिज्म का ककहरा सीख अमर उजाला (प्रिंट, नोएडा ऑफिस) से अपने करियर की शुरुआत की. य…और पढ़ें



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