ऑर्गेनिक खेती में इस ट्रिक का कोई तोड़ नहीं, हवा से खींच लेते हैं नाइट्रोजन

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ऑर्गेनिक खेती में इस ट्रिक का कोई तोड़ नहीं, हवा से खींच लेते हैं नाइट्रोजन


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ऑर्गेनिक खेती में इस ट्रिक का कोई तोड़ नहीं, हवा से खींच लेते हैं नाइट्रोजन

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Organic farming : जैविक खेती का चलन तेजी से बढ़ा है. अगर जैविक खेती के हिसाब से सूक्ष्म जीवों का चयन किया जाए, तो निश्चित रूप से चमत्कार देखने को मिल सकता है. बलिया के कृषि एक्सपर्ट प्रो. अशोक कुमार सिंह लोकल 18 से बताते हैं कि फफूंद, जीवाणु, नील हरित और काई शैवाल वातावरण में मौजूद नाइट्रोजन खींच लेते हैं. यह जीवाणु जिस खेत में या जिस फसल में उगते हैं, वहां पर सड़ करके खुद को मिट्टी में मिला देते हैं. ये ऐसे जैव उर्वरक हैं, जिनका इस्तेमाल फिलहाल बहुत कम किया जा रहा है.

बलिया. आज के दौर में खेती तेजी से बदल रही है. किसान एक बार फिर जैविक खेती की ओर रुख कर रहे हैं. कृषि एक्सपर्टों का दावा है कि खेती के हिसाब से अगर सूक्ष्म जीवों का चयन किया जाए, तो निश्चित रूप से चमत्कार देखने को मिल सकता है. लोकल 18 ने इस बारे में श्री मुरली मनोहर टाउन स्नातकोत्तर महाविद्यालय बलिया के मृदा विज्ञान और कृषि रसायन विभाग के एचओडी प्रो. अशोक कुमार सिंह से बात की. वे बताते हैं कि आजकल चारों ओर जैविक खेती (Organic Farming) की चर्चा है. जो इसके अवयव हैं, इसमें सबसे पहला जैविक खाद का प्रयोग है. यह गोबर, हरी पत्तियों और फसलों के अवशेष से तैयार होती है. दूसरा अवयव में गोमूत्र, मट्ठा, लहसुन, नीम की पत्ती और नीम का तेल इत्यादि का प्रयोग. तीसरा सबसे बड़ा प्राकृतिक साधन जैव उर्वरक है. इनमें सूक्ष्म जीवों का इस्तेमाल है. जैसे फफूंद, जीवाणु, नील हरित और काई शैवाल जो वातावरण में मौजूद नाइट्रोजन को खींचते हैं.

कैसे करते हैं काम

यह जीवाणु जिस खेत में या जिस फसल में उगते हैं, वहां पर सड़ करके अपने आप को मिट्टी में मिला देते हैं. इनको कल कारखानों और प्रयोगशालाओं में तैयार किया जाता है. इसमें धान की खेती के लिए एजोस्पिरिलम (Azospirillum) एक अत्यंत लाभकारी जैव उर्वरक (बायो-फर्टिलाइज़र) है, जो मुख्य रूप से फसलों की जड़ों के पास रहकर वायुमंडलीय नाइट्रोजन को पौधों के लिए बहुत ही उपयोगी रूप में बदलने का काम करता है. गेहूं, मक्का, कपास, और सरसों आदि के के लिए एजोटोबैक्टर (Azotobacter) फायदेमंद है. गन्ने के लिए एसीटोबैक्टर (Acetobacter) बहुत अच्छा है. बाजार में या सरकारी संस्थानों में इसके कल्चर मिलते हैं. इसे गोबर या पाउडर में मिलाकर खेतों में इस्तेमाल किया जाता है.

कहां मिलेंगे ये

यह ऐसे जैव उर्वरक हैं, जिनका इस्तेमाल फिलहाल बहुत कम किया जा रहा है. अगर इसका इस्तेमाल अधिक मात्रा में होने लगे, तो किसान अपने रासायनिक उर्वरकों का 25 से 30% बचत कर सकते हैं. लखनऊ के बायोटेक्नोलॉजी डिपार्मेंट या कौंसिल ऑफ साइंस टेक्नोलॉजी के अलावा, मंडल स्तर पर स्थापित संभागीय कृषि अधिकारी कार्यालय में उक्त जैव उर्वरक मिल जाते हैं. इन जैव उर्वरकों को अब प्राइवेट संस्थान भी तैयार कर रहे हैं. निश्चित रूप से जैव उर्वरकों का प्रयोग किसानों के लिए एक फायदा का सौदा साबित हो सकता है. किसानों को दोगुना से अधिक मुनाफा हो सकता है.

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Priyanshu Gupta

प्रियांशु गुप्‍ता बीते 10 साल से भी ज्यादा समय से पत्रकारिता में सक्रिय हैं. 2015 में भारतीय जनसंचार संस्थान (IIMC), दिल्ली से जर्नलिज्म का ककहरा सीख अमर उजाला (प्रिंट, नोएडा ऑफिस) से अपने करियर की शुरुआत की. य…और पढ़ें



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