जानिए 1992 बाबरी विध्वंस के समय फैजाबाद के एसएसपी रहे डीबी राय की कहानी
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बाबरी विध्वंस 1992 के समय फैजाबाद (अयोध्या) के एसएसपी रहे डी.बी. राय की वर्दी से संसद तक के सफर की अनकही कहानी. जानिए कैसे एक पुलिस कप्तान ने कारसेवकों के प्रति नरम रुख के चलते निलंबन झेला, फिर 9 साल की नौकरी रहते हुए भी इस्तीफा दे दिया. इसके बाद उन्होंने सुल्तानपुर को अपनी कर्मभूमि बनाया और भाजपा के टिकट पर दो बार सांसद चुने गए.
साल 1992 का बाबरी विध्वंस भारत की एक ऐसी ऐतिहासिक घटना थी, जिसने न सिर्फ देश की आंतरिक राजनीति में भूचाल ला दिया, बल्कि अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी भारत के सियासी पारे को गरमा दिया था. लेकिन क्या आप जानते हैं कि इस पूरे घटनाक्रम के दौरान अयोध्या (तत्कालीन फैजाबाद) के वरिष्ठ पुलिस अधीक्षक (SSP) कौन थे? अगर नहीं, तो आज हम आपको बताने जा रहे हैं उस दौर के पुलिस कप्तान डीबी राय के बारे में. बाबरी विध्वंस के बाद अपने पद से इस्तीफा देकर उन्होंने साल 1996 में भारतीय जनता पार्टी (BJP) के टिकट पर चुनाव लड़ा और लोकसभा पहुंचे. आइए, इस रोचक किस्से के माध्यम से जानते हैं कि उनका सुल्तानपुर से किस तरह का गहरा संबंध रहा है.
कौन थे डीबी राय?
सुल्तानपुर के वरिष्ठ पत्रकार विक्रम बृजेंद्र सिंह ‘लोकल 18’ को बताते हैं कि 1992 में जब बाबरी ढांचा ढहाया गया था, तब फैजाबाद के एसएसपी डीबी राय यानी देवेंद्र बहादुर राय थे. ये उत्तर प्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री वीर बहादुर सिंह के पीएसओ भी रह चुके थे. खाकी वर्दी से शुरू हुआ इनका सफर कारसेवक की पोशाक पहनकर पूरा हुआ. बाबरी विध्वंस के अगले दिन यानी 7 दिसंबर, 1992 को फैजाबाद के तत्कालीन जिलाधीश आरएन. श्रीवास्तव के साथ इन्हें भी सस्पेंड कर दिया गया था.
श्रीवास्तव और डीबी राय दोनों पर बाबरी ढांचा ढहाने के षड्यंत्र में शामिल होने के आरोप में मुकदमा चला. डीबी राय की नजदीकी बजरंग दल के तत्कालीन प्रमुख विनय कटियार से थी. राय 1971 बैच के प्रांतीय पुलिस सेवा (PPS) के अफसर थे. कारसेवकों के प्रति नरम रुख रखने वाले राय ने राष्ट्रपति शासन के दूसरे दिन उस वक्त कार्रवाई करने से साफ इनकार कर दिया था, जब परिसर से कारसेवकों को खाली कराने का फैसला हुआ. अपनी 9 साल की नौकरी बाकी रहते हुए ही डीबी राय ने खुद वॉलेंटरी रिटायरमेंट (VRS) ले लिया और बीजेपी में शामिल हो गए. वे साल 1996 और 1998 में बीजेपी के टिकट पर सुल्तानपुर से चुनाव लड़कर लोकसभा पहुंचे.
सुल्तानपुर से इस तरह था संबंध
जब बाबरी विध्वंस के बाद डीबी राय (देवेंद्रनाथ राय) ने वर्दी छोड़ी, तो उन्होंने सुल्तानपुर को अपनी नई राजनीतिक कर्मभूमि बनाया. इसके बाद सुल्तानपुर की जनता से उनका ऐसा गहरा नाता जुड़ा, जो हमेशा के लिए अटूट हो गया. साल 1996 के लोकसभा चुनाव में भारतीय जनता पार्टी ने उन्हें अपना उम्मीदवार बनाया. सुल्तानपुर की जनता ने उनके सिद्धांतों और त्याग का सम्मान करते हुए उन्हें भारी मतों से जिताया और पहली बार लोकसभा भेजा.
उनका यह रिश्ता यहीं खत्म नहीं हुआ. साल 1998 के आम चुनाव में भी सुल्तानपुर की जनता ने दोबारा उन पर अटूट भरोसा जताया और उन्हें फिर से अपना सांसद चुना. सुल्तानपुर उनके दिल के इतना करीब था कि सक्रिय राजनीति के बाद भी उनका परिवार हमेशा के लिए यहीं का होकर रह गया.
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राहुल गोयल न्यूज़ 18 हिंदी में हाइपरलोकल (यूपी, उत्तराखंड, हरियाणा और हिमाचल प्रदेश) के लिए काम कर रहे हैं. मीडिया इंडस्ट्री में उन्हें 16 साल से ज्यादा का अनुभव है, जिसमें उनका फोकस हमेशा न्यू मीडिया और उसके त…और पढ़ें