ऑक्डेनगंज चौराहे के पास बनी मूर्ति किसकी है? जिनको हम रोज लोग करते हैं नमन
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Ballia: अक्सर कई चौक-चौराहे पर महान विभूतियों की मूर्ति बनी होती है, लेकिन कुछ लोग इनके कार्यों के बारे में अनभिज्ञ रहते हैं. ऐसा ही एक चौराहा है ऑक्डेनगंज चौराहा, जहां एक महान शख्स की मूर्ति लगी है, लेकिन यहां के निवासियों को इनके बारे में ज्यादा जानकारी नहीं है.
बलिया: आज हम आपको उत्तर प्रदेश के बलिया जनपद से जुड़ी एक अजब-गजब कहानी बताने और दिखाने जा रहे हैं. जिले के हृदय भाग शहीद चौक से पहले ऑक्डेनगंज पुलिस चौकी से थोड़ी ही दूरी पर पड़ने वाला चौराहा बेहद प्रसिद्ध है. इसको ऑक्डेनगंज चौराहे के नाम से भी जानते हैं. यहां से होकर प्रतिदिन हजारों लोग गुजरते हैं, ट्रैफिक रुकता है, मुलाकाते होती हैं और तस्वीरें भी खींची जाती हैं. लेकिन हैरानी की बात यह है कि चौराहे पर स्थापित महान स्वतंत्रता संग्राम सेनानी की मूर्ति का नाम और इतिहास अधिकांश लोगों को पता ही नहीं है. जब राहगीरों से सवाल किया गया, तो कई लोग जवाब नहीं दे सके. आइए जानते हैं कि इधर से गुजरने वाले लोग क्या बोल रहे हैं और अधिकांश लोगों के नजर में अनजान यह सेनानी आखिर है कौन, इनका इतिहास क्या है?
मूर्ति के बारे में कुछ लोगों को जानकारी नहीं
दादा के छपरा निवासी दयाशंकर ने कहा कि उनका तो बलिया अपना घर द्वार है. उनसे चौराहे पर लगी मूर्ति के बारे में पूछा गया, तो उन्होंने कहा कि यह शायद किसी पांडेय जी की मूर्ति है. यह कहां के रहने वाले हैं, इसका पता नहीं है. उन्होंने कहा कि यह कहीं पर शहीद हुए होंगे, इसलिए इनकी मूर्ति लगी है. वहीं बसंतपुर निवासी बृजेश कुमार गुप्ता ने कहा कि इधर तीन-चार दिन पर जरूरी आना होता है. लेकिन उन्होंने हंसते हुए कहा कि यह किसकी मूर्ति याद नहीं आ रहा है.
लगभग इसी चौराहे पर 40 साल से पान का कारोबार करने वाले राम जी चौरसिया ने कहा कि यह ऑक्टेनगंज चौराहा है, जहां सेनानी उमाशंकर सोनार की मूर्ति लगी है. दशवीं के छात्र वर्मा जी ने कहा कि इधर आना तो छोड़िए, यही पर इनका घर भी है. यह किसकी मूर्ति है, याद नहीं आ रहा है. तमाम चौराहे पर लगी मूर्तियां कहीं ना कहीं हमारी महान विभूतियों की है, जिनके बारे में जानकारी फिर रखनी चाहिए, इस बात पर बच्चे ने अपनी सहमति दी.
बलिया के सपूत, लेकिन नाम नहीं
नगवां गांव से बाजार करने आए तमाम लोगों ने कहा कि उनका यही पर जन्म हुआ है. इन लोगों ने कहा कि इनका नाम बढ़िया था, लेकिन याद ही नहीं आ रहा है. किसी ने कहा, यह सेनानी उमाशंकर सिंह, लेकिन नहीं यह उमाशंकर यादव हैं. यह बलिया के थे, लेकिन इनसे कोई मतलब नहीं है. आज तक इनके बारे में कुछ मालूम नहीं हुआ है. लोगो ने कहा कि लोकल 18 अच्छा सवाल पूछ रहा है, लेकिन इनके बारे में कुछ पता ही नहीं है. यह बलिया की विभूति हैं, इनके बारे में पता होना चाहिए, खुद लोगो का ही कहना है.
अंग्रेजों के खिलाफ खोला था मोर्चा
प्रख्यात इतिहासकार डॉ. शिवकुमार सिंह कौशिकेय ने कहा कि यह स्वतन्त्रता संग्राम सेनानी उमाशंकर सोनार हैं, जिनका जन्म 1905 ई० में बलिया नगर के ओक्डेनगंज मुहल्ले में ही हुआ था. इनके पिता का नाम महादेव प्रसाद सोनार था. यह सन 1930 में महात्मा गांधी के आवाहन पर नमक सत्याग्रह आंदोलन में शामिल हुए और गिरफ्तारी 10 अगस्त 1942 को हुई. इन्होंने इसी ओक्डेनगंज चौराहे पर क्रांति का बिगुल बजाकर आगाज किया था और अंग्रेजी हुकुमत के विरुद्ध नारा भी लगाया था.
अग्रेजों ने दिया शारीरिक प्रताड़ना
सेनानी उमाशंकर सोनार नगर के डिक्टेटर के रूप में कार्यक्रमों का संचालन किया करते थे. अगस्त 1942 की रात अंग्रेज प्रशासक नेदर सोल जब फौजी ट्रेन से स्टेशन पर उतरा, तो उमाशंकर सोनार को गिरफ्तार किया और बहुत प्रताड़ना दी. जेल में शारीरिक प्रताड़ना देने के बाद चौक में दोबारा लाकर बेतों से मारा गया था. यहीं से इनकी तबियत खराब हुई और 81 वर्ष की आयु में 13 अगस्त 1986 में इनका निधन हो गया था. इन्होंने बलिया को स्वतंत्र कराने में अहम भूमिका निभाई थी.
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आर्यन ने नई दिल्ली के जामिया मिलिया इस्लामिया से पत्रकारिता की पढ़ाई की और एबीपी में काम किया. उसके बाद नेटवर्क 18 के Local 18 से जुड़ गए.