भगवान श्री कृष्ण के आगमन से लेकर महाभारत कालीन दौर की साक्षी है हस्तिनापुर की बूढ़ी गंगा

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भगवान श्री कृष्ण के आगमन से लेकर महाभारत कालीन दौर की साक्षी है हस्तिनापुर की बूढ़ी गंगा


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Hastinapur Budhi Ganga History: महाभारत कालीन इतिहास की बात होती है तो हस्तिनापुर का नाम सबसे पहले लिया जाता है. लेकिन बहुत कम लोग जानते हैं कि यहां बहने वाली बूढ़ी गंगा भी इस प्राचीन नगरी की ऐतिहासिक और धार्मिक पहचान का अहम हिस्सा मानी जाती है. स्थानीय मान्यताओं, ऐतिहासिक संदर्भों और विशेषज्ञों के अनुसार, यह जलधारा सदियों से हस्तिनापुर की सांस्कृतिक विरासत से जुड़ी हुई है. आज भी पांडेश्वर मंदिर, द्रौपदी मंदिर और अन्य प्राचीन स्थलों के आसपास बूढ़ी गंगा इस गौरवशाली अतीत की गवाही देती नजर आती है.

पश्चिमी उत्तर प्रदेश के मेरठ से करीब 45 किलोमीटर दूर स्थित हस्तिनापुर को महाभारत काल की धरती के रूप में जाना जाता है. इसका उल्लेख आज भी कई ऐतिहासिक तथ्यों, धार्मिक ग्रंथों और लोक मान्यताओं में मिलता है. इसी तरह बूढ़ी गंगा का भी विशेष महत्व बताया गया है. मान्यता है कि बूढ़ी गंगा की जलधारा महाभारत काल से ही इस क्षेत्र में बहती आ रही है और इसका इतिहास हस्तिनापुर की प्राचीन सभ्यता से जुड़ा हुआ है.

इसी विषय को समझने के लिए लोकल-18 की टीम ने हस्तिनापुर में लंबे समय से इस पर अध्ययन कर रहे शोभित विश्वविद्यालय के असिस्टेंट प्रोफेसर प्रियंक भारती से बातचीत की. उन्होंने बताया कि हस्तिनापुर कभी कुरु वंश की राजधानी था. यहीं राजा शांतनु, भीष्म पितामह, धृतराष्ट्र, कौरव और पांडव रहते थे. उस समय बूढ़ी गंगा का धार्मिक और सांस्कृतिक महत्व भी काफी अधिक माना जाता था.

उन्होंने बताया कि इसके प्रमाण आज भी हस्तिनापुर में देखने को मिलते हैं. अगर आप यहां आएंगे तो कर्ण मंदिर, पांडेश्वर महादेव मंदिर और द्रौपदी मंदिर के पास आज भी बूढ़ी गंगा की जलधारा दिखाई देती है. खास बात यह है कि इन प्रमुख धार्मिक स्थलों के आसपास से ही गंगा की पुरानी धारा गुजरती है, जिससे इस क्षेत्र का ऐतिहासिक महत्व और भी बढ़ जाता है.

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मान्यता है कि महाभारत काल में पांडेश्वर महादेव मंदिर के पास से ही बूढ़ी गंगा बहती थी. कहा जाता है कि पांचों पांडव पहले गंगा में स्नान करते थे और उसके बाद भगवान शिव की पूजा-अर्चना करते थे. मंदिर परिसर में स्थापित पांडवों की प्रतिमाएं भी इस मान्यता की याद दिलाती हैं. यही कारण है कि यह स्थान आज भी श्रद्धालुओं के लिए विशेष महत्व रखता है.

कुछ दूरी आगे बढ़ने पर द्रौपदी मंदिर स्थित है, जिसके पास आज भी घाट बना हुआ है. मान्यता है कि माता द्रौपदी यहां बूढ़ी गंगा में स्नान करने के बाद पूजा-अर्चना करती थीं. यह मंदिर इसलिए भी खास माना जाता है क्योंकि यहां आज भी बूढ़ी गंगा की धारा दिखाई देती है. वहीं मंदिर में स्थापित प्रतिमा महाभारत के चीरहरण प्रसंग की याद दिलाती है.

प्रियंक भारती ने बताया कि वर्तमान समय में हस्तिनापुर क्षेत्र हर साल बाढ़ की समस्या से जूझता है, जिससे किसानों और स्थानीय लोगों को काफी नुकसान उठाना पड़ता है. उनका मानना है कि अगर बूढ़ी गंगा के जिन हिस्सों में अवरोध है, उन्हें फिर से सुचारू कर दिया जाए तो इससे जल निकासी बेहतर हो सकती है और बाढ़ की समस्या काफी हद तक कम की जा सकती है.

अगर बूढ़ी गंगा की बात करें तो इसका संबंध महाभारत काल से जोड़ा जाता है. यह धारा ऐतिहासिक नगरी शुक्रताल से निकलकर हस्तिनापुर क्षेत्र के कई हिस्सों से गुजरते हुए आगे बृजघाट के पास गंगा की मुख्य धारा में मिलती है. समय के साथ गंगा की मुख्य धारा अपने पुराने मार्ग से करीब 10 किलोमीटर दूर चली गई, जबकि बूढ़ी गंगा पुराने रास्ते की याद आज भी संजोए हुए है.

आज भी शुक्रताल से लेकर बृजघाट तक कई स्थानों पर बूढ़ी गंगा की धारा साफ दिखाई देती है. हालांकि कुछ जगहों पर अतिक्रमण और अन्य कारणों से इसका प्राकृतिक मार्ग बाधित हो गया है. स्थानीय जानकारों का मानना है कि अगर इसके पुराने रास्ते को दोबारा विकसित किया जाए, तो इससे बाढ़ की समस्या कम होने के साथ-साथ हस्तिनापुर की ऐतिहासिक और सांस्कृतिक पहचान को भी नई मजबूती मिल सकती है.

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