जौनपुर के युवक की ईरान में मौत… 21 दिनों से शव का इंतजार कर रहे परिजन! हर दिन टूटती जा रही उम्मीद

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जौनपुर के युवक की ईरान में मौत… 21 दिनों से शव का इंतजार कर रहे परिजन! हर दिन टूटती जा रही उम्मीद


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Jaunpur News जौनपुर के शिवेंद्र प्रताप सिंह की ईरान में 27 मार्च को हादसे में मौत हो गई. उनका शव एक महीने से ईरान में है और परिजन विदेश मंत्रालय से मदद की गुहार लगा रहे हैं. कागजी कार्रवाई में मामला अटका हुआ है…और पढ़ें

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ईरान में हुई मौत 

हाइलाइट्स

  • जौनपुर के युवक का शव ईरान में अटका.
  • परिजन 21 दिनों से शव का इंतजार कर रहे.
  • सरकार से त्वरित कार्रवाई की मांग.

जौनपुर : जौनपुर के एक युवक का शव लगभग एक महीने से ईरान में पड़ा हुआ है. परिजन लगातार विदेश मंत्रालय से मदद की गुहार लगा रहे हैं, लेकिन अब तक कोई समाधान नहीं निकला है.गौरतलब है कि खुटहन थाना क्षेत्र के तिलवारी गांव निवासी शिवेंद्र प्रताप सिंह पोर्ट बंदर-ए- चरक पर टेक्नीशियन के रूप में काम करता था. 27 मार्च को एक हादसे में उसकी मौत हो गई. सोमवार को परिजनों ने डीएम से मिलकर अपनी व्यथा सुनाई.

गौरतलब है कि शिवेंद्र प्रताप सिंह एक मेहनती युवा था. बेहतर भविष्य की उम्मीद में वह ईरान गया था, जहां टेक्नीशियन के रूप में काम करता था. लेकिन 27 मार्च को एक हादसे में उसकी मौत हो गई. जैसे ही यह खबर परिवार को मिली, घर में कोहराम मच गया. जब यह खबर आसपास के लोगों को मिली तो पूरे गांव में मातम छा गया.

कागजी कार्रवाई में अटका मामला
बेटे की मौत की खबर मिलते ही परिजनों की आंखों से आंसू रुकने का नाम नहीं ले रहे थे. शिवेंद्र की एक झलक देखने के लिए सभी की आंखें तरस रही थीं. लेकिन, सबसे बड़ी समस्या यह थी कि उसका शव भारत कैसे आए. लोग सांत्वना दे रहे थे, लेकिन कोई समाधान नहीं मिल रहा था. स्थानीय जनप्रतिनिधियों और प्रशासन से भी मदद की अपील की गई है, लेकिन प्रक्रिया की जटिलताओं और कागजी कार्यवाही में मामला अटका हुआ है. परिजनों का कहना है कि सरकार को इस ओर गंभीरता से ध्यान देना चाहिए और ऐसे मामलों में त्वरित कार्रवाई की व्यवस्था होनी चाहिए, ताकि मृतक के परिजनों को और मानसिक पीड़ा न सहनी पड़े.

हर दिन टूटती जा रही उम्मीद
परिजनों का कहना है कि उन्होंने भारतीय दूतावास से लेकर विदेश मंत्रालय तक हर दरवाजा खटखटाया है, लेकिन अब तक सिर्फ आश्वासन ही मिले हैं. शिवेंद्र के पिता संदीप सिंह रोते हुए कहते हैं, “साहब, बस अब मेरे बेटे का शव ला दीजिए. अब और बर्दाश्त नहीं हो रहा. हर रोज हम यही सोचकर उठते हैं कि शायद आज उसका शव आ जाएगा, लेकिन हर दिन उम्मीद टूटती जा रही है।”

प्रवासी कामगारों की यही कहानी
यह घटना न सिर्फ एक परिवार की पीड़ा को उजागर करती है, बल्कि प्रवासी कामगारों की सुरक्षा और आपातकालीन परिस्थितियों में सरकार की भूमिका पर भी सवाल खड़े करती है. शिवेंद्र की कहानी सैकड़ों उन युवाओं की कहानी है जो अपने घर से दूर, सपनों की तलाश में निकलते हैं — लेकिन कई बार उनका अंत इतना दुखद होता है कि शब्द भी कम पड़ जाते हैं.

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