बहराइच में बनते हैं खास ढोल, मोहर्रम में गूंज उठता है पूरा इलाका, जानिए कीमत
बहराइच: मोहर्रम का महीना आते ही बहराइच का गुलामअलीपुरा इलाका ढोल की आवाज़ से गूंजने लगता है. ये सिर्फ आवाज़ नहीं, बल्कि यहां की मेहनत, परंपरा और पहचान है. इस मोहल्ले में सैकड़ों परिवार ऐसे हैं, जो पीढ़ियों से ढोल बनाने के काम से जुड़े हैं. जैसे ही मोहर्रम नज़दीक आता है, यहां की गलियों में लकड़ी, ड्रम और चमड़े की महक के साथ-साथ हथौड़ी और रेत की आवाज़ सुनाई देने लगती है.
पहले की जमाने में ढोल पूरी तरह लकड़ी से बनते थे और 3000 से 4000 रुपये में बिकते थे. वहीं अब ढोलों ने अपना रूप बदला है. अब ये ढोल लोहे के ड्रम से बनाए जाते हैं, जो पहले से हल्के होते हैं और कीमत भी कम होती है. इनकी रेट 1000 से 2000 रुपए के बीच है. इन ढोलों को उठाना आसान होता है और आवाज़ भी पहले से तेज और स्पष्ट होती है.
गुलामअलीपुरा के कारीगरों का कहना है कि एक 18 इंच की ढोल बनाने में करीब 2-3 घंटे लगते हैं, और एक कारीगर दिन में 3-4 ढोल तैयार कर सकता है. यह मेहनत न सिर्फ रोज़ी-रोटी का जरिया है. बल्कि सांस्कृतिक विरासत भी है, जो पीढ़ियों से चली आ रही है.
मोहर्रम में सिर्फ ढोल ही नहीं, ‘तासा’ नामक वाद्य यंत्र की भी खूब मांग रहती है. ढोल बजाने से पहले तासा की धुन शुरू होती है, जिससे माहौल बनता है. तासा की कीमत 400 से 500 रुपए के बीच होती है और इसे दो छड़ी (डंडियों) से बजाया जाता है. आमतौर पर छड़ियां प्लास्टिक की होती हैं, जिससे बजाने में सरलता होती है. ढोल और तासा की ये जोड़ी 200 से 300 मीटर तक अपनी आवाज़ पहुंचा सकती है, जिससे मोहर्रम का माहौल जीवंत हो उठता है.
धार्मिक मान्यता और बहस
मोहर्रम में ढोल बजाने को लेकर अलग-अलग रायें हैं. कुछ लोग इसे ग़म का इज़हार मानते हैं, तो कुछ इसे हराम कहते हैं. कई धार्मिक जानकारों का मानना है कि अगर ढोल प्रदर्शन या खुशी के लिए बजाय जाए, तो यह सही नहीं है. इसलिए ज़रूरी है कि लोग ढोल बजाने से पहले उसकी भावनात्मक और धार्मिक गंभीरता को समझें और दूसरों की आस्था का भी सम्मान करें.
कहां मिलते हैं ढोल?
अगर आप भी मोहर्रम के लिए ढोल या तासा खरीदने की सोच रहे हैं, तो आपको बहराइच शहर के छावनी चौराहे के पास पंचायती मंदिर के बगल में स्थित मोहल्ला गुलामअलीपुरा जाना होगा. यहां आपको ढोल की कई दुकानें मिल जाएंगी, जहां कारीगर खुद ही आपके सामने ढोल बनाकर देते हैं.