Aligarh News: अपने बच्चों को मौलाना भेजते हैं आधुनिक स्कूल और देते हैं मदरसे की तालीम पर जोर, जानें और क्या बोले इफराहीम
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Madrasa Education: मुस्लिम समाज में यह सवाल लंबे समय से उठता रहा है कि मौलाना अपने बच्चों को कहां तालीम दिलाते हैं-मदरसे में या आधुनिक स्कूलों में. मौलाना इफराहीम हुसैन ने साफ कहा कि मौजूदा दौर में केवल मदरसे या केवल मॉडर्न शिक्षा बच्चों के लिए काफी नहीं है. जरूरत है एक संतुलित शिक्षा प्रणाली की, जिसमें कुरान की समझ के साथ साइंस और टेक्नोलॉजी की पढ़ाई भी शामिल हो.
अलीगढ़. समाज में अक्सर यह चर्चा होती रही है कि मुस्लिम समाज के मौलाना अपने बच्चों की तालीम कहां दिलाते हैं- क्या वे मदरसे को तरजीह देते हैं या आधुनिक स्कूलों को? इसी मुद्दे पर लोकल 18 ने अलीगढ़ के मुस्लिम धर्मगुरु मौलाना इफराहीम हुसैन से खास बातचीत की. मौलाना ने साफ कहा कि आज के दौर में केवल मदरसे या सिर्फ मॉडर्न एजुकेशन बच्चों के लिए पर्याप्त नहीं है. जरूरत है एक संतुलित शिक्षा प्रणाली की, जिसमें कुरान की समझ और साइंस-टेक्नोलॉजी दोनों शामिल हों.
मौलानाओं के बच्चों की तालीम पर सवाल
मौलाना इफराहीम हुसैन ने माना कि मौलानाओं के बच्चों की शिक्षा हमेशा चर्चा का विषय रही है. अधिकांश मौलाना अपने बच्चों को मदारिस (मदरसे) में ही भेजते हैं, जहां कुरान, हदीस और दीन की इल्मी रहनुमाई दी जाती है. लेकिन कुछ मौलाना, जिनकी आर्थिक स्थिति और साधन बेहतर होते हैं, वे अपने बच्चों को मॉडर्न स्कूलों में पढ़ाते हैं. यही वजह है कि समाज में अक्सर असमानता और दोहरे मापदंड दिखाई देते हैं.
मजहबी और आधुनिक तालीम का संगम जरूरी
मौलाना हुसैन ने कहा कि आज के जमाने में बच्चों को सिर्फ दीन या सिर्फ दुनियावी तालीम देना काफी नहीं है. “जरूरत है ऐसी तालीम की जिसमें मजहबी इल्म और दुनियावी ज्ञान दोनों हों. अगर कुरान की समझ के साथ बच्चों को साइंस और टेक्नोलॉजी सिखाई जाए तो वे समाज और मुल्क के लिए ज्यादा कारगर साबित होंगे.” उन्होंने यह भी बताया कि आज ऐसे स्कूल और संस्थान मौजूद हैं जहां कुरान और साइंस दोनों की पढ़ाई साथ-साथ कराई जाती है. इन संस्थानों को बढ़ावा देना चाहिए और मौलानाओं को खुद आगे बढ़कर अपने बच्चों को इनमें दाखिला दिलाना चाहिए.
समान शिक्षा से आएगी बराबरी
मौलाना ने जोर देकर कहा कि अगर अमीर और गरीब दोनों तबकों के बच्चों को समान शिक्षा दी जाएगी तो समाज में मसावात (बराबरी) और एकता कायम होगी. इससे किसी भी तरह का भेदभाव नहीं होगा और तालीम का असली मकसद पूरा हो सकेगा. उन्होंने कहा कि मौलानाओं को खुद अपने बच्चों की शिक्षा में मिसाल कायम करनी चाहिए.
दोहरे मापदंड से बचने की सलाह
मौलाना इफराहीम हुसैन ने साफ कहा कि अगर मौलाना अपने बच्चों को सिर्फ बड़े और आधुनिक स्कूलों में भेजते हैं लेकिन आम लोगों को मदरसे की तालीम पर जोर देते हैं, तो यह एक दोहरे चेहरे जैसा होगा. “मौलाना अगर खुद मिसाल पेश करेंगे तो समाज भी उनके नक्शे-कदम पर चलेगा.”
आने वाली पीढ़ी के लिए सही रास्ता
अंत में मौलाना ने कहा कि आने वाली पीढ़ी को कुरान और साइंस दोनों की शिक्षा देना ही सबसे बेहतर रास्ता है. यह बच्चों को न सिर्फ बेहतर इंसान बनाएगा बल्कि समाज और मुल्क का जिम्मेदार नागरिक भी बनाएगा. उन्होंने कहा कि अगर मजहबी और आधुनिक तालीम का संगम हर तबके तक पहुंचे, तो यकीनन मुस्लिम समाज और पूरा देश तरक्की की राह पर और मजबूती से आगे बढ़ सकेगा.