Gorakhpur News : GAU में लीच थेरेपी से गंभीर बीमारियों का सफल इलाज, IPD में शुरू हुआ उपचार, जानें फायदे
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Gorakhpur Latest News : महायोगी गुरु गोरखनाथ आयुष विश्वविद्यालय में आयुर्वेद की प्राचीन चिकित्सा पद्धति “जलोका अवचारण” यानी लीच थेरेपी के माध्यम से कई गंभीर बीमारियों का सफल उपचार किया जा रहा है. पंचकर्म विशेषज्ञ डॉ. मनोरमा सिंह के नेतृत्व में संचालित इस चिकित्सा पद्धति ने सोरायसिस और वैरिकोज़ वेन जैसे जटिल रोगों से पीड़ित मरीजों के लिए नई उम्मीद जगाई है.
गोरखपुर: जलोका अवचारण आयुर्वेद की प्राचीन चिकित्सा विधियों में से एक है, जिसमें जोंकों (लीच) के माध्यम से शरीर से दूषित रक्त निकालकर रोगों का निवारण किया जाता है. डॉ. मनोरमा सिंह बताती हैं कि यह थेरेपी सोरायसिस, वैरिकोज वेन, एक्ज़िमा, गठिया और रक्तसंबंधी विकारों में अत्यंत कारगर है. इस पद्धति में जोंक के लार में मौजूद प्राकृतिक तत्व सूजन कम करते हैं, रक्त प्रवाह को नियंत्रित करते हैं और त्वचा की कोशिकाओं को पुनर्जीवित करते हैं.
मरीजों में दिखा उल्लेखनीय सुधार
गोरखपुर के आयुष विश्वविद्यालय में हाल ही में तीन मरीजों पर लीच थेरेपी का उपचार किया गया, जिनमें दो सोरायसिस और एक वैरिकोज वेन से ग्रसित थे. डॉ. सिंह बताती हैं कि एक सोरायसिस पीड़ित व्यक्ति के पैर की त्वचा इतनी कठोर हो चुकी थी कि सुई लगाने पर भी रक्त नहीं निकलता था. लीच थेरेपी के तीसरे सत्र तक त्वचा में लचीलापन लौट आया और रक्त संचार सामान्य हो गया. अब मरीज बिना दर्द के चलने-फिरने में सक्षम है.
इसी तरह, वैरिकोज वेन से पीड़ित एक मरीज के पैरों की सूजन और नसों का फूला हुआ आकार भी कम होने लगा है. डॉक्टरों के अनुसार यह थेरेपी रक्त प्रवाह को बेहतर बनाकर नसों के दबाव को घटाती है, जिससे मरीज को दर्द और भारीपन से राहत मिलती है.
वैरिकोज वेन में सावधानी और व्यायाम जरूरी
विशेषज्ञों का कहना है कि वैरिकोज़ वेन की समस्या अक्सर नसों की दीवार कमजोर होने, लंबे समय तक खड़े रहने या बैठे रहने से बढ़ती है. ऐसे मरीजों को नियमित व्यायाम, संतुलित आहार और सक्रिय जीवनशैली अपनानी चाहिए. डॉ. सिंह सलाह देती हैं कि ऐसे लोग पैरों की हल्की मालिश करें और बहुत देर तक एक ही मुद्रा में खड़े या बैठे न रहें. इससे रक्त प्रवाह सुचारू रहता है और नसों में दबाव कम होता है.
आयुष विश्वविद्यालय में आधुनिक सुविधाओं के साथ पारंपरिक उपचार
महायोगी गुरु गोरखनाथ आयुष विश्वविद्यालय पारंपरिक आयुर्वेदिक उपचारों को आधुनिक चिकित्सा ढांचे से जोड़ने की दिशा में कार्यरत है. हाल ही में यहां इनपेशेंट डिपार्टमेंट (IPD) शुरू किया गया है, जहां मरीजों को सर्जरी के बाद की देखभाल और पंचकर्म उपचार की सुविधा दी जा रही है. दस मरीजों को सर्जरी के बाद भर्ती किया गया है, जबकि चार मरीज पंचकर्म चिकित्सा ले रहे हैं. लीच थेरेपी को भी IPD में शामिल कर लिया गया है, ताकि गंभीर त्वचा और रक्त विकारों से जूझ रहे मरीजों को समग्र चिकित्सा मिल सके.
आयुर्वेद को नई दिशा देने की पहल
डॉ. मनोरमा सिंह का मानना है कि लीच थेरेपी केवल पारंपरिक उपचार नहीं, बल्कि विज्ञान आधारित पद्धति है जो शरीर के रक्त संचार को संतुलित कर रोग प्रतिरोधक क्षमता को भी मजबूत करती है. उन्होंने कहा कि “यह उपचार मरीजों को प्राकृतिक तरीके से राहत देता है और शरीर के भीतर से उपचार की प्रक्रिया शुरू करता है.”