Magh Mela 2026 : अहंकार से मुक्ति, आत्मशुद्धि, वैराग्य…कुंभ और माघ मेले के शाही स्नान में क्या-क्या अंतर, सबका अलग-अलग फल
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Shahi snan : माघ मेले में अलग-अलग अखाड़े शाही स्नान में भाग लेते हैं. इनमें मुख्य किन्नर अखाड़ा, जूना अखाड़ा, निर्मोही अखाड़ा, उदासीन अखाड़ा और किन्नर अखाड़ा है. प्रशासन की ओर से अलग-अलग अखाड़ों के स्नान के लिए अलग-अलग समय दिया जाता है ताकि टकराव की स्थिति न पैदा हो. शाही स्नान के लिए अखाड़ों के अलग घाट भी निर्धारित रहते हैं. कुंभ के शाही स्नान और माघ के शाही स्नान में फर्क होता है. माघ मेले के शाही स्नान में जुलूस नहीं होता है. ऐसे ही कई और फर्क हैं.
प्रयागराज में छह मुख्य तिथियों पर शाही स्नान होता है. पहला पौष माह की पूर्णिमा पर, दूसरा मकर संक्रांति, तीसरा मौनी अमावस्या, चौथा वंसत पंचमी, पांचवा माघी पूर्णिमा, छठवां और आखिरी महाशिवरात्रि को होता है. इन छह शाही स्नान में मौनी अमावस्या के स्नान को सबसे पुण्य और मुख्य माना जाता है. इसी दिन मेले का सबसे प्रमुख स्नान होता है. कहा जाता है कि मौनी अमावस्या को किए गए गंगा स्नान से सबसे पवित्र और पुण्यदायी फल की प्राप्ति होती है. इसलिए भारी संख्या में देशभर से लोग प्रयागराज पहुंचते हैं.

माघ मेले में अलग-अलग अखाड़ा शाही स्नान में भाग लेते हैं. इनमें मुख्य किन्नर अखाड़ा, जूना अखाड़ा, निर्मोही अखाड़ा, उदासीन अखाड़ा और किन्नर अखाड़ा आदि शामिल हैं. प्रशासन अलग-अलग अखाड़ों के स्नान के लिए अलग-अलग समय देता है, ताकि टकराव की स्थिति न बने. स्नान के वक्त उस घाट पर आम स्नानार्थियों के आने पर रोक रहती है.

माघ मेले में जो शाही स्नान होता है, उसमें जुलूस नहीं होता है. हालांकि, अखाड़े की शक्ति और पहचान दोनों नजर आती है. न सिर्फ धार्मिक भव्यता झलकती है बल्कि, आध्यत्म की शक्ति का भी एहसास होता है. हजारों संत और महात्मा एक साथ स्नान के लिए अलग-अलग सवारियों से पहुचंते हैं. हजारों लोग उन्हें ही देखने के लिए आते हैं.
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कुंभ के शाही स्नान और माघ के शाही स्नान में फर्क होता है. कुंभ के शाही स्नान में अखाड़ों का जुलूस निकलता है. शाही ध्वज व पेशवाई आदि होता है. हालांकि, माघ मेले में ऐसा नहीं होता है. माघ मेले में आस्था और परम्परागत से अखाड़े स्नान करते हैं. माघ मेले में आडंबरों से अखाड़ा पूरी तरह से परहेज करते हैं. जबकि, कुंभ में अखाड़ों का शाही स्नान एकदम भव्य और अलौकिक होता है.

अखाड़ा के संतों को शाही स्नान का अलग-अलग फल मिलता है. मान्यताओं के अनुसार नागा, संन्यासी और संतों को स्नान से अहंकार से मुक्ति और आत्मशुद्धि के साथ वैराग्य की सिद्धि होती है. इससे साधना सिद्ध होती है और मोक्ष के मार्ग खुलते हैं. शाही स्नान के माध्यम से संदेश दिया जाता है कि सनातन के रक्षक अभी तप और सिद्धि में लीन हैं.

शाही स्नान में अखाड़ों से लोगों को जोड़ा जाता है. इसमें नए ब्रह्मचारी, अनुयायी और संन्यासी दीक्षा लेते हैं. मंत्रोच्चार के बाद उन्हें अखाड़ों से जोड़ा भी जाता है. अखाड़ों में परम्परा के अनुसार ही स्नान का क्रम तय किया जाता है. मान्यताओं के अनुसार जिसका क्रम ऊपर रहता है, उसे विशेष सम्मान प्राप्त होता है.