Mustard Farming : वरुणा से लेकर पूसा बोल्ड तक…सरसों की ये किस्में जादुई! कोई रोग नहीं लगता, पैदावार भी डबल
बलिया. तिलहनी फसलों में सरसों सबसे खास है, जो रबी सीजन में उगाई जाती है. यह खेत को सुंदर बना देती है. न केवल तेल उत्पादन के लिए, बल्कि पशु चारे और हरी खाद के रूप में भी उपयोगी है. देश के कई राज्यों जैसे उत्तर प्रदेश, राजस्थान, मध्य प्रदेश, बिहार और हरियाणा में इसकी खेती बड़े पैमाने पर होती है. अगर किसान सही किस्म का चुनाव और उचित समय पर बुवाई करें, तो प्रति हेक्टेयर उपज में सीधे दोगुनी बढ़ोतरी हो सकती है. श्री मुरली मनोहर टाउन स्नातकोत्तर महाविद्यालय बलिया के मृदा विज्ञान और कृषि रसायन विभाग के विभाग अध्यक्ष प्रो. डॉ. अशोक कुमार सिंह बताते हैं कि सरसों में समयानुसार ऐसी किस्में विकसित हुई हैं, जो रोग-प्रतिरोधी हैं और अधिक तेल देती हैं. आइए जानते हैं.
RH-749 : यह हरियाणा कृषि विश्वविद्यालय की ओर से विकसित किस्म है, जो सफेद जंग रोग के प्रति प्रतिरोधी है और उच्च उत्पादन देती है.
Pusa Bold : यह सबसे लोकप्रिय किस्मों में से एक है. इसकी अवधि लगभग 135–145 दिन होती है और इसमें 40–42% तक तेल पाया जाता है.
Pusa Mustard 25 (NPJ-112 ) : यह जल्दी पकने वाली किस्म है, जो लगभग 120 दिनों में तैयार हो जाती है और सरसों की झुलसा बीमारी के प्रति सहनशील होती है.
Giriraj (DRMR-150-35) : यह नई किस्म है जो सूखा सहन कर सकती है और इसमें तेल की मात्रा अधिक होती है.
बुवाई का सही समय
सरसों की बुवाई का सबसे उपयुक्त समय अक्टूबर के मध्य से नवंबर के पहले सप्ताह तक माना जाता है. देर से बुवाई करने पर फूल आने के समय तापमान बढ़ने से उत्पादन पर असर पड़ सकता है. उत्तर भारत में किसान 15 अक्टूबर से 10 नवंबर तक बुवाई करें, तो बहुत अच्छे परिणाम मिलते हैं. सरसों की खेती के लिए दोमट या हल्की दोमट मिट्टी सबसे अच्छी रहती है. मिट्टी का pH मान 6.0 से 7.5 तक होना चाहिए. ठंडी और शुष्क जलवायु में यह फसल शानदार होती है. बुवाई के समय प्रति हेक्टेयर 80 किलोग्राम नाइट्रोजन, 40 किलोग्राम फॉस्फोरस और 40 किलोग्राम पोटाश देने से उत्पादन बढ़ता है. फसल को विशेषकर फूल आने और दाना भरने के समय 2 से 3 सिंचाई की जरूर होती है.