Prayagraj News: 16 साल से अधिक उम्र की बीवी से यौन संबंध दुष्कर्म नहीं, जानें हाईकोर्ट ने इस्लाम के मामले में क्या कहा
प्रयागराज. हाईकोर्ट ने कानपुर देहात के एक दो दशक पुराने मामले में दुष्कर्म के आरोपी पति को बरी कर दिया है. आरोपी इस्लाम उर्फ पलटू को निचली अदालत ने वर्ष 2007 में सात वर्ष की सजा सुनाई थी. उस पर आरोप था कि उसने शिकायतकर्ता की 16 वर्षीय बेटी को बहला-फुसलाकर भगा ले जाकर उससे शारीरिक संबंध बनाए. अदालत ने इस फैसले को रद्द करते हुए कहा कि घटना के समय पीड़िता 16 वर्ष से अधिक उम्र की थी और दोनों के बीच संबंध निकाह के बाद बने थे. यह मामला कानपुर देहात के भोगनीपुर थाना क्षेत्र का है. वर्ष 2005 में आरोपी इस्लाम उर्फ पलटू के खिलाफ शिकायत दर्ज कराई गई थी कि उसने 16 वर्षीय किशोरी को बहला-फुसलाकर भगा लिया. आरोपी ने अपनी सफाई में कहा कि उसने 29 अगस्त 2005 को कथित पीड़िता से विधिवत निकाह किया था और निकाहनामा अदालत में प्रस्तुत किया. दोनों कुछ समय तक कालपी और भोपाल में किराए के मकान में पति-पत्नी के रूप में साथ रहे.
निचली अदालत ने यह माना कि लड़की नाबालिग थी, इसलिए आरोपी को दोषी ठहराया. अदालत ने उसे धारा 363 (अपहरण), धारा 366 (अवैध रूप से महिला को ले जाना) और धारा 376 (दुष्कर्म) के तहत सजा सुनाई. इन धाराओं के तहत उसे क्रमशः पांच वर्ष, सात वर्ष और सात वर्ष की सजा तथा कुल चार हजार रुपये का जुर्माना लगाया गया था.
हाईकोर्ट में अपील और दलीलें
आरोपी ने इस फैसले को इलाहाबाद हाईकोर्ट में चुनौती दी. जस्टिस अनिल कुमार (दशम) की एकलपीठ ने इस मामले में सुनवाई की. बचाव पक्ष ने तर्क दिया कि घटना के समय पीड़िता 16 वर्ष से अधिक उम्र की थी और उसने स्वेच्छा से आरोपी के साथ निकाह किया था. निकाह के बाद दोनों वैवाहिक जीवन जी रहे थे, इसलिए इस पर दुष्कर्म का आरोप लागू नहीं होता.
एफआईआर और गवाहियों में विरोधाभास
हाईकोर्ट ने पाया कि पीड़िता के माता-पिता के बयानों में ऐसा कोई प्रमाण नहीं है, जिससे यह साबित हो सके कि आरोपी ने उसे बहकाया या जबरन अपने साथ ले गया. वहीं, पीड़िता ने भी बयान दिया कि जब आरोपी ने उसे साथ चलने के लिए कहा तो वह खुद अपनी इच्छा से गई. कोर्ट ने कहा कि इस स्थिति में धारा 363 के तहत “फुसलाने” और “ले जाने” का अपराध नहीं बनता.
कानूनी व्याख्या और सुप्रीम कोर्ट का हवाला
कोर्ट ने कहा कि मुस्लिम पर्सनल लॉ के अनुसार विवाह की न्यूनतम आयु 15 वर्ष है. जबकि बाल विवाह निषेध अधिनियम, 2006 के तहत लड़की के विवाह की न्यूनतम आयु 18 वर्ष निर्धारित है. इस मामले में सवाल यह उठा कि दोनों कानूनों में से कौन प्रभावी होगा. इस पर कोर्ट ने सुप्रीम कोर्ट के इंडिपेंडेंट थॉट बनाम भारत संघ (2017) के फैसले का हवाला दिया. शीर्ष अदालत ने उस समय आईपीसी की धारा 375 (दुष्कर्म) के अपवाद 2 में संशोधन किया था. पहले इस अपवाद में यह लिखा था कि “15 वर्ष से अधिक आयु की पत्नी से यौन संबंध दुष्कर्म नहीं होगा”. सुप्रीम कोर्ट ने इसे संशोधित कर “18 वर्ष से अधिक आयु की पत्नी” कर दिया था. सर्वोच्च न्यायालय ने यह भी स्पष्ट किया था कि यह संशोधन भविष्य के लिए लागू होगा, न कि पूर्ववर्ती मामलों पर. इसलिए 2017 से पहले की घटनाओं में यह संशोधन लागू नहीं होगा.
हाईकोर्ट का निष्कर्ष
इन सभी तथ्यों पर विचार करते हुए इलाहाबाद हाईकोर्ट ने कहा कि अपीलार्थी इस्लाम उर्फ पलटू को दुष्कर्म का दोषी नहीं ठहराया जा सकता, क्योंकि घटना 2005 की है. उस समय पीड़िता की उम्र 16 वर्ष थी और दोनों ने विधिवत निकाह किया था. इस प्रकार यह संबंध वैवाहिक जीवन का हिस्सा था और इसे दुष्कर्म नहीं माना जा सकता.