Wheat Farming : एक चूक घटा सकती है गेहूं का उत्पादन, कब करें दूसरी सिंचाई, जानें समय और तरीका
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Wheat Farming Irrigation : गेहूं की फसल में सिंचाई ही उत्पादन का रास्ता तय करती है. आमतौर पर गेहूं में तीन से चार सिंचाई की जरूरत होती है. पहली सिंचाई बुवाई के 20 से 25 दिन बाद और दूसरी 40 से 45 दिन पर करना चाहिए. सिंचाई में हुई छोटी सी चूक फसल की ग्रोथ रोक सकती है, जिससे उत्पादन में भारी गिरावट आ सकती है. सिंचाई का निर्धारण केवल दिनों पर नहीं बल्कि मिट्टी के प्रकार और मौसम पर भी निर्भर करता है. रेतीली मिट्टी में जल्दी-जल्दी सिंचाई की जरूरत होती है, जबकि भारी मिट्टी में अंतराल बढ़ाया जा सकता है. अगर इस समय सिंचाई में देरी हुई तो पूरे सीजन फसल पिछड़ सकती है.
गेहूं की फसल में पहली सिंचाई सबसे महत्त्वपूर्ण मानी जाती है. इसे ‘सीआरआई’ यानी जड़ फुटान की अवस्था कहते हैं. बुवाई के करीब 20 से 25 दिन बाद जब पौधे में जड़ों का विकास शुरू होता है, तब नमी की कमी से पौधे कमजोर रह जाते हैं. इस समय हल्का पानी देने से कल्लों की संख्या बढ़ती है. अगर इस समय सिंचाई में देरी हुई तो पूरे सीजन फसल पिछड़ सकती है.

दूसरी सिंचाई बुवाई के 40 से 45 दिन बाद की जानी चाहिए. यह वह समय होता है जब पौधे के तने का विकास तेजी से हो रहा होता है. इस दौरान पौधों को पोषक तत्वों की अधिक आवश्यकता होती है. समय पर पानी मिलने से नाइट्रोजन का अवशोषण बेहतर होता है. इससे पौधे की ऊंचाई और मजबूती बढ़ती है. सिंचाई में लापरवाही इस अवस्था में पौधों को पीला बना सकती है.

जब फसल 60 से 70 दिन की हो जाती है, तब उसमें गांठे बनने लगती हैं. इस तीसरी सिंचाई से पौधे की संरचना मजबूत होती है. यदि इस समय खेत में दरारें पड़ने लगे, तो समझ लें कि उत्पादन कम हो सकता है. सही समय पर पानी देने से बालियों का आकार बड़ा होता है. यह सिंचाई फसल की हरियाली को अंत तक बनाए रखने में मदद करती है.
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चौथी सिंचाई का समय तब आता है जब फसल में बालियां निकलनी शुरू होती हैं. यह अवस्था बहुत नाजुक होती है क्योंकि पानी की कमी से बालियां छोटी रह जाती हैं या उनमें दानों की संख्या कम हो जाती है. हालांकि, इस समय ध्यान रखें कि बहुत गहरा पानी न भरें. सिर्फ उतनी ही सिंचाई करें, जिससे जमीन में नमी बनी रहे और बालियों का विकास सुचारू रूप से हो सके.

सिंचाई करते समय विधि का चुनाव भी उत्पादन पर असर डालता है, क्यारी बनाकर सिंचाई करना सबसे उत्तम रहता है ताकि पानी पूरे खेत में समान रूप से पहुंचे. ज्यादा पानी भरने से जड़ों को ऑक्सीजन नहीं मिल पाती जिससे फसल पीली पड़ जाती है. आधुनिक तकनीकों मिनी स्प्रिंकलर का प्रयोग भी किया जा सकता है, जो कम पानी में बेहतर नमी देने में सक्षम है.

सिंचाई का निर्धारण केवल दिनों पर नहीं बल्कि मिट्टी के प्रकार और मौसम पर भी निर्भर करता है. रेतीली मिट्टी में जल्दी-जल्दी सिंचाई की जरूरत होती है, जबकि भारी मिट्टी में अंतराल बढ़ाया जा सकता है. यदि बीच में बारिश हो जाए तो अगली सिंचाई को टाला जा सकता है. किसानों को हमेशा अपनी जमीन की नमी और मौसम विभाग की चेतावनी को ध्यान में रखकर ही पानी देना चाहिए.