अमेरिका से अरब तक… बरेली के मांझे ने कैसे जीता दुनिया का दिल, क्या ‘चाइनीज’ मांझा अब निगल जाएगा शान?
Bareilly News: आसमान में उड़ती पतंगों की डोर अगर बरेली की न हो, तो पेंच लड़ाने का मजा अधूरा रह जाता है. वजीर उस्ताद और रियासत मियां जैसे दिग्गजों के हाथों से तैयार हुआ 200 साल पुराना बरेली का सूती मांझा आज भी अपनी मजबूती और धार के लिए सात समंदर पार तक मशहूर है. लेकिन, अफसोस! जिस हुनर ने कनाडा से लेकर खाड़ी देशों तक भारत का नाम रोशन किया, वह आज ‘चाइनीज’ मांझे की घुसपैठ और सरकारी उपेक्षा के कारण अपने अस्तित्व की आखिरी लड़ाई लड़ रहा है.
बरेली का मांझा उद्योग 200 वर्षों से भी अधिक पुराना है. इसकी सबसे बड़ी खासियत इसका शुद्ध सूती धागे से बना होना है. यही वजह है कि दिल्ली, अमृतसर, जयपुर और अहमदाबाद जैसे भारतीय शहरों के अलावा कनाडा, ऑस्ट्रेलिया, अमेरिका, ब्रिटेन और खाड़ी देशों (यूएई, सऊदी अरब) में भी इसकी भारी मांग रही है. वजीर उस्ताद, चुन्नन उस्ताद और रियासत मियां जैसे नामों से बना मांझा देशभर के पेशेवर पतंगबाजों की पहली पसंद माना जाता है.
कैसे बनता है यह जादुई धागा?
बरेली के मांझे को तैयार करने की प्रक्रिया बेहद जटिल और पारंपरिक है. सबसे पहले मोटे चावलों को उबालकर एक गाढ़ा लेप यानी ‘कांजी’ तैयार की जाती है. इस लेई में पिसा हुआ कांच, साबूदाना, विशेष जड़ी-बूटियाँ और रंग मिलाए जाते हैं. हालांकि, हाल के वर्षों में सुरक्षा को देखते हुए कांच की जगह लाल पत्थर के पाउडर का उपयोग भी शुरू हुआ है. सूती धागे को खंभों के बीच फैलाकर कारीगर अपने हाथों से इस मिश्रण का लेप चढ़ाते हैं, जिसे स्थानीय भाषा में ‘सूताई’ कहा जाता है.
संकट में उद्योग, नायलॉन मांझे की मार
इनावली बरेली के ‘मांझा आसमानी पतंग’ के बड़े व्यापारी, जिनकी कुमार टॉकीज (सराय) में विशाल दुकान है, बताते हैं कि पिछले कुछ दशकों में इस उद्योग को भारी क्षति हुई है. साल 2011 के बाद से बाजार में सस्ते नायलॉन (प्लास्टिक) मांझे ने कब्जा कर लिया है. यह नायलॉन मांझा पारंपरिक सूती मांझे की तुलना में लगभग 70% सस्ता होता है, जिसने स्थानीय कारीगरों के व्यापार को ठप कर दिया है.
चीन से आए जानलेवा मांझे के कारण प्रशासन अक्सर छापेमारी करता है, लेकिन इसकी गाज अनजाने में पारंपरिक सूती मांझा व्यापारियों पर भी गिरती है. इसके अलावा, 18% तक GST और कच्चे माल की आसमान छूती कीमतों ने छोटे कारीगरों की कमर तोड़ दी है.
अस्तित्व बचाने की जंग और डिजिटल राह
कभी इस उद्योग से करीब 1.5 लाख लोग जुड़े थे, लेकिन काम कम होने के कारण अब कई उस्ताद कारीगर मजदूरी करने को मजबूर हैं. हालांकि, उम्मीद अभी बाकी है. नई पीढ़ी के व्यापारी अब BareillyManjha.co.in जैसी वेबसाइटों के माध्यम से सीधे ग्राहकों तक पहुँच रहे हैं, ताकि बरेली की इस ऐतिहासिक विरासत को लुप्त होने से बचाया जा सके.