इस्लाम में सगाई की अनुमति, पर रिंग सेरेमनी पर पाबंदी क्यों? अलीगढ़ शाही मुफ्ती ने बताया सही तरीका और शरीयत की सीमाएं
Last Updated:
Engagement in Islam: अलीगढ़ के शाही चीफ मुफ्ती, मौलाना चौधरी इफराहीम हुसैन ने इस्लाम में सगाई और ‘रिंग सेरेमनी’ की असलियत स्पष्ट की है. उन्होंने बताया कि निकाह से पहले परिवारों की रजामंदी से रिश्ता तय करना पूरी तरह जायज है, लेकिन स्टेज पर अंगूठी पहनाना या हाथ पकड़ना इस्लामी शरीयत के खिलाफ है. चूंकि निकाह से पहले लड़का-लड़की एक-दूसरे के लिए ‘गैर-महरम’ होते हैं, इसलिए रिंग सेरेमनी की आधुनिक रस्मों का इस्लाम से कोई ताल्लुक नहीं है. विस्तार से पढ़ें…
Engagement in Islam: वर्तमान समय में मुस्लिम समाज में भी शादी से पहले सगाई और रिंग सेरेमनी का चलन तेजी से बढ़ रहा है. लेकिन क्या यह तरीका इस्लामी शिक्षाओं के अनुरूप है? अक्सर निकाह से पहले रिश्ते तय करने, स्टेज पर अंगूठी पहनाने और विभिन्न रस्मों को लेकर सवाल उठते रहते हैं. इन्हीं शंकाओं को दूर करते हुए ‘शाही चीफ मुफ्ती ऑफ उत्तर प्रदेश’ मौलाना चौधरी इफराहीम हुसैन ने इस्लाम की रोशनी में सगाई और रिंग सेरेमनी की हकीकत (सच्चाई) स्पष्ट की है.
क्या इस्लाम में सगाई का कॉन्सेप्ट है?
मौलाना चौधरी इफराहीम हुसैन के अनुसार, इस्लाम में शादी से पहले सगाई यानी एंगेजमेंट का कॉन्सेप्ट (विचार) मौजूद है, बशर्ते उसे शरीयत की सीमाओं के भीतर रहकर अदा किया जाए. उन्होंने बताया कि कुरान से यह साबित होता है कि निकाह से पहले लड़के की तरफ से लड़की के लिए विवाह का प्रस्ताव (पैगाम) देना पूरी तरह जायज है. दोनों परिवारों का आपसी बातचीत से रिश्ता तय करना, एक-दूसरे के बारे में जानकारी लेना और रजामंदी जाहिर करना ही असल मायनों में ‘मुस्लिम सगाई’ है.
रिंग सेरेमनी: क्यों है शरीयत के खिलाफ?
मुफ्ती साहब ने स्पष्ट किया कि सगाई का अर्थ केवल ‘रिश्ता तय करना’ है, न कि ऐसी रस्में निभाना जो शरीयत के विरुद्ध हों. उन्होंने एक महत्वपूर्ण बिंदु पर जोर देते हुए कहा, ‘जब तक निकाह मुकम्मल नहीं होता, लड़का और लड़की एक-दूसरे के लिए ‘गैर-महरम’ रहते हैं.’ ऐसी स्थिति में स्टेज पर सार्वजनिक रूप से एक-दूसरे को अंगूठी पहनाना, हाथ पकड़ना या किसी भी प्रकार का शारीरिक संपर्क करना इस्लाम में जायज नहीं है. मौलाना के मुताबिक, आज के दौर की ‘रिंग सेरेमनी’ महज एक दिखावा और रस्मी कार्यक्रम है, जिसका इस्लामी शिक्षाओं से कोई वास्ता नहीं है.
तय करें शरीयत की सीमाएं
उन्होंने अंत में साफ किया कि सगाई केवल तभी जायज है जब वह सादगी और शरीयत के दायरे में हो. परिवारों की सहमति से रिश्ता पक्का करना और जरूरी बातें तय करना सही है, लेकिन कोई भी ऐसा कार्य जो इस्लामी उसूलों के खिलाफ हो, वह इस्लाम की नजर में ‘ना-जायज’ मानी जाएगी.
About the Author
राहुल गोयल न्यूज़ 18 हिंदी में हाइपरलोकल (यूपी, उत्तराखंड, हरियाणा और हिमाचल प्रदेश) के लिए काम कर रहे हैं. मीडिया इंडस्ट्री में उन्हें 16 साल से ज्यादा का अनुभव है, जिसमें उनका फोकस हमेशा न्यू मीडिया और उसके त…और पढ़ें