ईंट-भट्ठों की धूल से सपनों की उड़ान तक, कानपुर का ‘अपना घर’, जहां संवर रहे बच्चों के सपने
कानपुर: देश के बड़े शहरों में जब विकास की चमक दिखाई देती है, तो उसी चमक के पीछे कुछ ऐसे बच्चे भी होते हैं, जो ईंट-भट्ठों, निर्माण स्थलों और अस्थायी झुग्गियों में अपना बचपन गंवा देते हैं, लेकिन कानपुर महानगर में एक ऐसी जगह है, जिसने इन बच्चों की किस्मत की लकीर बदल दी है. इस जगह का नाम है अपना घर, जिसे आशा ट्रस्ट संचालित करता है. यह सिर्फ एक स्कूल नहीं, बल्कि एक पूरा जीवन-विद्यालय है, जहां किताबों के साथ जीवन पढ़ाया जाता है.
‘अपना घर’ में पढ़ने वाले बच्चे प्रवासी मजदूर परिवारों से आते हैं. कभी ये बच्चे स्कूल का नाम सुनकर भी घबरा जाते थे, लेकिन आज यही बच्चे शहर के अच्छे-अच्छे स्कूलों में पढ़ रहे हैं. यहां पढ़ाई के साथ-साथ बच्चों को संस्कार, अनुशासन और आत्मनिर्भरता सिखाई जाती है. वे अपना बिस्तर खुद लगाते हैं, रसोई में मदद करते हैं और आपस में मिलकर काम करना सीखते हैं. यही वजह है कि यहां से निकलने वाले बच्चे सिर्फ पढ़े-लिखे नहीं, बल्कि जिम्मेदार नागरिक बनते हैं.
खेत, थाली और आत्मनिर्भरता का पाठ
‘अपना घर’ की सबसे अनोखी पहचान है यहां की जैविक खेती. स्कूल परिसर में बच्चे खुद सब्जियां उगाते हैं और उन्हीं सब्जियों से उनका भोजन तैयार होता है. यह प्रक्रिया बच्चों को यह सिखाती है कि खाना सिर्फ प्लेट में नहीं आता, बल्कि मेहनत, धैर्य और प्रकृति से जुड़ाव का नतीजा होता है. आज जब मोबाइल और स्क्रीन ने बच्चों को जमीन से दूर कर दिया है, वहीं ‘अपना घर’ उन्हें मिट्टी से जोड़ रहा है.
कानपुर से दुनिया तक जुड़ा क्लासरूम
यह स्कूल समय के साथ कदम मिलाकर चलता है. यहां ऑनलाइन माध्यम से देश-विदेश के शिक्षक और एक्सपर्ट बच्चों को पढ़ाते हैं. अंग्रेजी बोलना, साइंस को प्रयोग से समझना, नई टेक्नोलॉजी जानना, ये सब अब इन बच्चों के लिए सपना नहीं रहा है. छोटे से परिसर में बैठकर बच्चे दुनिया से जुड़ रहे हैं और बड़े सपने देखने लगे हैं.
‘अपना घर’ के संचालक महेश कुमार कहते हैं कि हमारा मकसद सिर्फ बच्चों को स्कूल में दाखिला दिलाना नहीं है, हम चाहते हैं कि ये बच्चे खुद पर भरोसा करना सीखें. अगर इन्हें सही माहौल और मौका मिल जाए, तो ये किसी से कम नहीं हैं. आज हमारे बच्चे अच्छे कॉलेजों में पढ़ रहे हैं, कुछ नौकरी कर रहे हैं, यही हमारी सबसे बड़ी कमाई है.
सफलता की प्रेरक कहानियां
इस स्कूल से निकलकर कई बच्चे आज इंजीनियरिंग, ग्रेजुएशन और प्रोफेशनल कोर्स कर रहे हैं. कुछ सामाजिक क्षेत्र में काम कर रहे हैं, तो कुछ निजी कंपनियों में नौकरी कर रहे हैं. ये कहानियां बताती हैं कि गरीबी या प्रवासी जीवन कोई अभिशाप नहीं, अगर सही दिशा और शिक्षा मिल जाए. ‘अपना घर’ यह साबित करता है कि बदलाव के लिए बड़े बजट या आलीशान इमारतें जरूरी नहीं होती हैं. कानपुर से निकली यह पहल आज पूरे देश के लिए एक संदेश है. अगर हर शहर में एक ‘अपना घर’ हो जाए, तो लाखों बच्चों का भविष्य संवर सकता है.