कस्टोडियल डेथ पर हाईकोर्ट का आदेश, सरकार बनाए गाइडलाइन, 10 लाख मुआवजा भी दें
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कस्टोडियल डेथ को लेकर इलाहाबाद हाईकोर्ट की लखनऊ बेंच ने बड़ा फैसला सुनाते हुए सरकार को मृतक के परिवार को मुआवजे के संबंध में गाइलाइंस बनाने का निर्देश दिया है. पीलीभीत जिले में कस्टोडियल डेथ को लेकर नाबालिग मृतक बंदी के परिजनों ने याचिका दायर की थी, जिसपर सुनवाई करते हुएकोर्ट ने सरकार को 10 लाख रुपये मुआवजे के रूप में मृतक के परिजनों को तीन हफ्ते के भीतर देने का भी आदेश दिया है.
कस्टोडियल डेथ को लेकर लखनऊ बेंच का बड़ा फैसला. (सांकेतिक तस्वीर)
लखनऊः कस्टोडियल डेथ को लेकर इलाहाबाद हाईकोर्ट की लखनऊ बेंच ने बड़ा फैसला सुनाते हुए सरकार को मृतक के परिवार को मुआवजे के संबंध में गाइलाइंस बनाने का निर्देश दिया है. पीलीभीत जिले में कस्टोडियल डेथ को लेकर नाबालिग मृतक बंदी के परिजनों ने याचिका दायर की थी, जिसपर सुनवाई करते हुएकोर्ट ने सरकार को 10 लाख रुपये मुआवजे के रूप में मृतक के परिजनों को तीन हफ्ते के भीतर देने का भी आदेश दिया है. पीलीभीत जिला जेल में याची के नाबालिग पुत्र की अप्राकृतिक मृत्यु के मामले की सुनवाई की गई है.
कस्टडी में युवक की हो गई थी मौत
याचिका के मुताबिक वर्ष 2016 में पीलीभीत जिले के पूरनपुर थाने की पुलिस ने याची के नाबालिग पुत्र के खिलाफ दुष्कर्म,पॉक्सो का मामला दर्ज किया था. याची का पुत्र करीब 3 साल 10 महीने तक कारावास में रहा.
जमानत मिलने के बाद उसे ट्रायल कोर्ट के सामने पेश होना था. लेकिन वो हाज़िर नहीं हो सका. इसके बाद ट्रायल कोर्ट की ओर से जारी वारंट के अनुपालन में उसे गिरफ्तार कर जेल भेज दिया गया. 20 फरवरी 2024 को उसकी जेल में मौत हो गई. मजिस्ट्रेटी जांच में पाया गया कि याची के पुत्र ने आत्महत्या की थी.
कोर्ट ने कहा- मौलिक अधिकारों का हुआ हनन
कोर्ट ने याचिका पर सुनवाई के दौरान कहा कि याची के पुत्र की मृत्यु राज्य प्राधिकारियों की अभिरक्षा और नियंत्रण में हुई है. अभिलेख पर उपलब्ध सामग्री से साफ सिद्ध होता है कि भारतीय संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत मिले मौलिक अधिकारों का उल्लंघन हुआ है. मामले में हाई कोर्ट लखनऊ बेंच ने अहम टिप्पणी भी की है. कोर्ट ने कहा, ” हिरासत में यातना मानव गरिमा का उल्लंघन है. जो पीड़ित के आत्म सम्मान और अस्तित्व को मूल से नष्ट कर देती है. जब भी मानव गरिमा आहत होती है, सभ्यता एक कदम पीछे चली जाती है.’
मानवाधिकार आयोग ने भी दिया था तीन लाख रुपये देने का आदेश
इसके अलावा हाईकोर्ट ने कहा कि जांच प्रणाली से यातना को खत्म करने की सिफारिश के बावजूद पुलिस हिरासत और जेल में यातना और मृत्यु की बढ़ती घटनाएं चिंताजनक है. हिरासत में हिंसा और मौतें कानून के शासन की मूल भावना पर प्रहार है. उनकी सुरक्षा सुनिश्चित करने का कठोर और अपरिहार्य जिम्मेदारी सरकार पर है. बता दें कि इस मामले में राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग ने मृतक के परिवार को तीन लाख रुपए मुआवजा देने का आदेश दिया था. इस आदेश का अनुपालन न होने पर याची ने ये याचिका दाखिल की थी.
जिस पर हाईकोर्ट लखनऊ बेंच ने 10 लाख रुपए मुआवजा देने का आदेश दिया है.
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प्रशान्त राय मूल रूप से उत्तर प्रदेश के गाजीपुर जिले के रहने वाले हैं. प्रशांत राय पत्रकारिता में पिछले 8 साल से एक्टिव हैं. अलग-अलग संस्थानों में काम करते हुए प्रशांत राय फिलहाल न्यूज18 हिंदी के साथ पिछले तीन …और पढ़ें