क्यों हर कोई पहुंच रहा है गाज़ीपुर के इस रेस्टोरेंट में? जानिए क्या है खास
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गाज़ीपुर में बना यह अनोखा बांस रेस्टोरेंट इन दिनों हर जगह चर्चा में है. करीब 800 बांसों से तैयार यह सात्विक, इको-फ्रेंडली कैफ़े शांत माहौल, पैतृक डिज़ाइन और केले के पत्ते पर परोसे जाने वाले भोजन के लिए लोगों को खूब पसंद आ रहा है. कई लोग इसे ‘मिनी हिल-स्टेशन वाइब्स’ वाली जगह बता रहे हैं, जो शहर की भीड़-भाग से दूर सुकून का एहसास कराती है.
इस फोटो में दिख रहा यह एंट्रेंस कोई आम गेट नहीं, बल्कि पूरे रेस्टोरेंट का वाइब सेट कर देता है. जैसे ही आप अंदर कदम रखते हैं, शहर की भागदौड़ पीछे छूट जाती है. चारों तरफ बांस, मिट्टी जैसा माहौल और हल्की-सी लाइटिंग एकदम गांव के त्योहार जैसा अहसास देती है. देवांश चौबे के इस रेस्टोरेंट की खासियत यही है कि यहां शांति, सात्विकता और सौम्यता तीनों एक साथ मिलती हैं. यह रेस्टोरेंट बंसी बाजार हनुमान मंदिर के पास स्थित है. सितंबर 2025 में शुरू हुआ यह रेस्टोरेंट नवंबर में पूरी तरह एक्टिव हो चुका है.

इस लंबे गलियारे को देखकर सबसे पहले यही महसूस होता है कि आप किसी ग्रामीण मेले या झोपड़ी वाले रास्ते से गुजर रहे हैं. छत पर तिरपाल, दीवारों पर बांस की सजावट और ऊपर झूलती हल्की रोशनियां पूरे माहौल को सॉफ्ट और सुकूनभरा बना देती हैं. देवांश बताते हैं कि उनका मकसद यही था कि लोग आते ही रिलैक्स महसूस करें—न शोर, न भीड़, सिर्फ शांति और सादा वाइब.

यह फोटो रेस्टो के उस हिस्से का है, जहां हट-स्टाइल बैठने की व्यवस्था बनाई गई है. ऊंचे स्ट्रॉ कोन, बांस के फ्रेम और फेयरी लाइट्स इसे एकदम फ़िल्मी सौंदर्य प्रदान करते हैं. यहां बैठकर ऐसा महसूस होता है जैसे आप गांव के किसी शांत कोने में बने छोटे घर में बैठे हों. लोगों का कहना है कि अब इंस्टा-योग्य जगहों पर खाना पसंद किया जाता है और ये हट्स बिल्कुल वैसा ही अनुभव देते हैं.
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ये फोटो उस एरिया की है, जहां टोकरी-स्टाइल बांस की हैंगिंग लाइट्स लगी हैं. हल्की हरी रोशनी और ऊपर फैली सफेद नेट की ड्रेपिंग इस जगह को रेस्टोरेंट के सबसे एस्थेटिक स्पॉट्स में से एक बनाती है. यहां बैठकर फोटो क्लिक करना खुद में एक अलग अनुभव है. रेस्टोरेंट का यह हिस्सा सबसे पहले तैयार किया गया था, ताकि लोग आते ही वॉव महसूस करें.

इस फोटो में दिख रहा बांस का काउंटर बिल्कुल वैसा है जैसा गांव के मेलों में तात्कालिक दुकानों का होता है, लेकिन यहां इसे नए जमाने के अनुरूप ढाला गया है. फेयरी लाइट्स और रॉ स्ट्रॉ रूफ इसे एकदम प्राकृतिक लुक देते हैं. देवांश का कहना है कि सात्विक भोजन होने के कारण वे चाहते थे कि सर्विंग एरिया भी पूरी तरह इको-फ्रेंडली दिखे.

इस तस्वीर में ऊपर लगी जालीदार परदियां और हल्की-हल्की टिमटिमाती लाइटें पूरे रेस्टोरेंट का माहौल तय करती हैं. हल्का हरा-नीला रंग, बांस की लंबी लकड़ियां और नरम रोशनी मिलकर ऐसा नज़ारा बनाते हैं, जैसे किसी सुकून देने वाले ध्यान-स्थल में बैठे हों. देवांश बताते हैं कि लोग यहां सिर्फ खाने नहीं, बल्कि दिमागी आराम लेने भी आते हैं छत की यह सजावट उसी शांति का एहसास कराने के लिए बनाई गई है. उनका कहना है कि हर महीने ऊपर के डिजाइन के कपड़े को बदला जाएगा, ताकि माहौल हमेशा ताज़ा और आकर्षक बना रहे.

यह वाइड शॉट दिखाता है कि रेस्टोरेंट के अंदर कितनी खुली और सांस लेने जैसी जगह है. फूस की झोपड़ी जैसी साज-सज्जा, बांस की दीवारें और हल्की नरम रोशनी मिलकर पूरा देहाती रिसॉर्ट जैसा माहौल बना देती हैं. बच्चों के लिए छोटा-सा पानी वाला खेल-घेरा भी यहीं से नज़र आता है. गाज़ीपुर में ऐसा पर्यावरण-अनुकूल और सात्विक कैफ़े पहली बार बनाया गया है, जहां लोग शोर-शराबे से दूर कम दाम में अच्छा माहौल पा सकें. यहां भोजन भी पारंपरिक तरीके से केले के पत्ते पर परोसा जाता है, ताकि सादगी और सात्विकता—दोनों का स्वाद मिल सके.