खरपतवार ही बन गए सूरजमुखी की खेती के ‘सुपरफ्रेंड’, उत्पादन बढ़ाने का रामबाण तरीका
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बलिया के शोध ने किसानों को चौंका दिया: खतरनाक खरपतवार अब सूरजमुखी की खेती में बढ़ा सकते हैं उत्पादन और घटा सकते हैं लागत. तीन साल के शोध में पता चला कि जलकुंभी और पार्थेनियम जैसी फसल-हानी करने वाली घासें, खेत में सही समय और मात्रा में इस्तेमाल होने पर मिट्टी की उर्वरता बढ़ाती हैं और महंगे उर्वरकों की जरूरत कम करती हैं.
बलिया. फसल के दुश्मन ही अब कृषि के लिए सबसे बड़े प्रिय मित्र बनेंगे, ताज़ा शोध ने इस सोच को सच साबित कर दिया है. जो खरपतवार अब तक किसानों के लिए सिरदर्द बने हुए थे, वही अब खेती की लागत घटाने और उत्पादन बढ़ाने का रामबाण उपाय बनते दिख रहे हैं. यह उत्तर प्रदेश के बलिया जिले से सबसे बड़ी खबर है, जिसमें किसानों का पूरा लाभ ही लाभ छिपा हुआ है. श्री मुरली मनोहर टाउन स्नातकोत्तर महाविद्यालय बलिया के कृषि रसायन और मृदा विज्ञान विभाग के शोधार्थी संदीप कुमार गुप्ता ने प्रो. अशोक कुमार सिंह के नेतृत्व में एक बेहद महत्वपूर्ण शोध पर सफलता पाई है, जो हैरान करने वाला है. उनका अध्ययन सूरजमुखी की खेती में टिकाऊ पोषक तत्व प्रबंधन पर केंद्रित रहा, जिसमें बलिया की जलोढ़ मिट्टी को आधार बनाकर विभिन्न जैविक और अकार्बनिक संसाधनों का प्रभाव जांचा गया है.
बलिया के मृदा विज्ञान और कृषि रसायन विभाग के एचओडी प्रो. अशोक कुमार सिंह ने कहा कि, वह खुद लगभग 22 सालों से रिसर्च और पढ़ाने के साथ खेती में आ रही नई तकनीकों को लेकर किसानों को जागरूक करते आ रहे हैं. इस शोध की सबसे खास और चौंकाने वाली बात यह रही कि जलकुंभी और पार्थेनियम (डिस्को घास) जैसे खतरनाक खरपतवार, जिन्हें आमतौर पर खेतों के लिए हानिकारक माना जाता है, उन्हें ही हरे रूप में खाद के तौर पर इस्तेमाल करने से जबरदस्त परिणाम मिल सकते हैं.
शोध में हुए चौंकाने वाले खुलासें
इस शोध में पाया कि, यदि इन खरपतवारों को 5 टन प्रति बीघा की मात्रा में बुवाई से 20 से 25 दिन पहले खेत में मिला दिया जाए, तो यह न केवल मिट्टी की उर्वरता बढ़ाते हैं, बल्कि फसल उत्पादन में भी बढ़ोतरी करते हैं. अध्ययन में गोबर की खाद, मुर्गी की लीद, कम्पोस्ट, बायोचार और धान के पुआल जैसे संसाधनों के साथ इन खरपतवारों के संयुक्त उपयोग को भी परखा गया है. नतीजे बेहद उत्साहजनक रहे कि मिट्टी में कार्बन अंश बढ़ा, पोषक तत्वों की उपलब्धता सुधरी और सूरजमुखी की गुणवत्ता व उत्पादन दोनों में इजाफा हुआ है, जो अन्य सभी फसलों के लिए बेहद उपयोगी है. इस तकनीक से किसानों को दोहरा लाभ मिलता है. एक तरफ खेतों से खतरनाक खरपतवारों से छुटकारा मिलता है, तो वहीं दूसरी ओर महंगे उर्वरकों पर खर्च कम होता है.
यह तरीका पूरी तरह पर्यावरण-अनुकूल है, जिससे मिट्टी का दीर्घकालिक स्वास्थ्य भी बेहतर बना रहता है. यह शोध न केवल वैज्ञानिक दृष्टि से महत्वपूर्ण है, बल्कि किसानों के लिए एक व्यावहारिक और सस्ता समाधान भी है. स्थानीय स्तर पर उपलब्ध संसाधनों का बेहतर उपयोग कर खेती को लाभकारी और टिकाऊ बनाने की दिशा में यह एक बड़ा कदम साबित हो सकता है. हालांकि, शोधार्थी को इस विषय पर डिग्री भी हो चुकी हैं. इस विषय को सिद्ध करने में लगभग तीन साल का समय लगा है. यह खोज किसानों के लिए किसी वरदान से कम नहीं, जहां समस्या ही समाधान बन गई है, और खेतों में हरियाली के साथ खुशहाली का नया रास्ता भी खुल गया है. यह कहना गलत नहीं होगा कि, सही जानकारी और सही दिशा में प्रयास हो, तो जहरीले पदार्थ भी अमृत का काम कर सकते हैं.
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नमस्ते मेरा नाम मोनाली है, पेशे से पत्रकार हूं, ख़बरें लिखने का काम है. लेकिन कैमरे पर समाचार पढ़ना बेहद पसंद है. 2016 में पत्रकारिता में मास्टर्स करने के बाद पांच साल कैमरे पर न्यूज़ पढ़ने के साथ डेस्क पर खबरे…और पढ़ें