गर्भगृह से शिखर तक… राम मंदिर जितना भव्य, उतना ही चत्मकारिक, कण-कण में छिपा साइंस
धर्मध्वज फहराने के साथ राम जन्मभूमि मंदिर पूरी तरह बनकर तैयार तो हो गया और इसके आंदोलन की लोगों ने बहुत बात कर ली, इसको लेकर हुई राजनीति की भी खूब बात हुई, रामकथाओं की भी बात हुई और आस्था की भी बात हुई. बातें हुईं, गीत गाए गए, उल्लास व्यक्त किया गया. लेकिन एक और बिंदु है जो सब भारतीयों को जानना चाहिए. और भारतीयों को ही क्यों, दुनिया भर के लोगों को जानना चाहिए, समझना चाहिए. धर्म और आस्था अपनी जगह हैं, लेकिन इसका आर्किटेक्चर, वास्तुशास्त्र, इसका स्ट्रक्चर, इसका डिजाइन- सब कुछ वाकई समझने की जरूरत है, अध्ययन करने की जरूरत है. दुनिया भर के बड़े-बड़े सिविल और स्ट्रक्चरल इंजीनियरिंग और आर्किटेक्चर के विशेषज्ञ इसको स्टडी कर रहे हैं और सदियों तक करते रहेंगे, तो आप तो समझ लीजिए. इतना तो आप जान गए कि अयोध्या में भव्य राम मंदिर का निर्माण पूरा हो गया है. प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने मंदिर के शिखर पर 191 फीट ऊंचा केसरिया धर्मध्वज फहरा दिया. आम पब्लिक बस सोचती है कि मंदिर तो आस्था का प्रतीक है, लेकिन इसके पीछे कितनी वैज्ञानिक सोच है, उस पर भी ध्यान देने की जरूरत है.
सबसे पहले तो मंदिर का डिजाइन देखिए. उत्तर भारत में मंदिर डिजाइन की एक प्राचीन शैली है, जिसको कहते हैं नागर शैली. ये मंदिर भी नागर शैली में बना है. तो नागर शैली क्या होती है? नागर शैली के मंदिर में शिखर बहुत ऊंचा और नुकीला होता है. जैसे-जैसे ऊपर जाते हैं, शिखर नुकीला होता जाता है और शिखर के टॉप पर एक गोल पत्थर होता है, जिसको आमलक कहते हैं. उसके ऊपर रखा जाता है कलश. प्राचीन जमाने में ये कलश सोने-चांदी का होता था. राम मंदिर के हर शिखर पर यही है- गोल पत्थर और कलश, और अब सबसे ऊंचे शिखर पर धर्मध्वज भी फहरा दिया गया है. तो नागर शैली की पहचान एक तो शिखर से होती है. और दूसरा मुख्य बिंदु जो नागर शैली में होता है, वह ये कि इसमें गर्भगृह चौकोर होता है. दक्षिण भारत के मंदिर आपने देखे हों तो उनमें गर्भगृह रेक्टैंगुलर होता है, यानी आयताकार होता है, जबकि नागर शैली में स्क्वेयर होता है. ऐसे ही राम मंदिर में गर्भगृह चौकोर है.
जमीन से ऊंचा मंदिर क्यों
और नागर शैली में गर्भगृह के अंदर छत पर गोल-गोल घूमते हुए फूल जैसे डिजाइन बने हुए होते हैं. इनको कहते हैं ‘कुंड’ या ‘पद्म’. और वास्तु के अनुसार मंदिर का मुख पूर्व दिशा की तरफ रखा जाता है, ताकि सूर्योदय पर किरणें सीधा मंदिर पर पड़ें. अब सवाल ये कि सूर्योदय पर भी सूरज की पोजिशन तो साल भर शिफ्ट होती रहती है. मंदिर तो शिफ्ट होगा नहीं. तो राम जन्मभूमि मंदिर को ऐसे डिजाइन किया गया है कि रामनवमी के दिन सूर्य की किरणें सीधे रामलला पर पड़ें. ये बिल्कुल महीन कैलकुलेशन के बाद एकदम ऐसी दिशा तय की गई मंदिर की.
यानी नागर शैली का मतलब हुआ- ऊंचे प्लेटफॉर्म पर बना मंदिर, जिस पर चढ़कर जाना पड़े, और जिसका मुख्य शिखर नुकीला हो, तो पूरा मंदिर नीचे से देखने पर ऐसा लगता है जैसे आसमान को छूने की कोशिश कर रहा हो. ये शैली गुप्त काल, यानी 5वीं शताब्दी से चली आ रही है. राम मंदिर में मुख्य शिखर 128 फीट ऊंचा है और कुल तीन बड़े शिखर हैं. पूरा मंदिर 360 फीट लंबा, 235 फीट चौड़ा और 161 फीट ऊंचा है. ये तो आप जानते ही होंगे कि ये तीन मंजिला है, हर मंजिल 20 फीट ऊंची है.
इसमें 392 खंभे और 44 दरवाजे हैं. हर खंभे और दीवार पर देवताओं, फूलों, जानवरों और रामायण की कहानियों की नक्काशी है. मंदिर का डिजाइन बनाया सोमपुरा परिवार ने, जो 15 पीढ़ियों से मंदिर बनाने वाले विशेषज्ञ हैं. चंद्रकांत सोमपुरा ने 1988 में पहला डिजाइन बनाया था. उनके बेटों ने 2020 में इसे अपडेट किया.

अब आ जाइए मंदिर के लेआउट पर
इसका लेआउट पांच तत्वों पर आधारित है- पृथ्वी, जल, अग्नि, वायु और आकाश. तो वो कैसे? मतलब जैसे मंदिर के उत्तर-पूर्व कोण को खुला रखा गया है ताकि हवा और पानी का बहाव खुला रहे. इसके न सिर्फ आध्यात्मिक कारण हैं बल्कि इंजीनियरिंग के लिहाज़ से इससे बाढ़ का ख़तरा कम होता है. नागर शैली के साथ ही मंदिर में दक्षिण भारत की द्रविड़ शैली के भी कुछ तत्व शामिल किए गए हैं. जैसे रामेश्वरम और तिरुपति के मंदिरों से प्रेरित नक्काशी. क्योंकि श्रीराम तो पूरे भारत के हैं, इसलिए डिज़ाइन भी पैन-इंडियन है.
इस डिजाइन को बनाने के लिए आधुनिक BIM तकनीक का भी इस्तेमाल किया गया. BIM यानी बिल्डिंग इन्फ़ॉर्मेशन मॉडलिंग. मतलब निर्माण से पहले 3D मॉडल तैयार किया गया. यानी कंप्यूटर पर पूरा मंदिर बनाकर चेक किया गया. यानी हर पत्थर की जगह पहले से तय की गई.
अब आइए निर्माण की मुख्य बात पर यानी निर्माण सामग्री पर. इसमें लोहा या स्टील बिल्कुल भी इस्तेमाल नहीं किया गया. क्यों? क्योंकि लोहे की उम्र सिर्फ़ 80–90 साल होती है, क्योंकि ये ज़ंग खा सकता है, नमी की वजह से. राम मंदिर को ऐसे डिज़ाइन किया गया है कि ये 1000 साल तक टिका रहे.
मंदिर के लिए खास चुने गए पत्थर…
भूकंप में मेटल यानी धातु से ये पत्थर ज़्यादा लचीला होता है, क्योंकि ये कंपन को सोख लेता है. इसलिए इसको चुना गया. इसके अलावा ‘राम शिलाएं’ हैं- यानी वो विशेष ईंटें जिन पर ‘श्रीराम’ लिखा है. ये चूने और मिट्टी से बनी हैं, जो प्राचीन तरीक़े से मज़बूत होती हैं.
लेकिन ख़ास बात ये है कि पत्थरों को जोड़ा कैसे गया है. कोई सीमेंट इस्तेमाल नहीं हुआ है. पत्थरों को जोड़ने के लिए ‘लॉक एंड की’ तकनीक इस्तेमाल की गई है. मतलब जैसे बच्चे ब्लॉक जोड़कर मॉडल बनाते हैं, वैसे. इंटरलॉक कर दिए गए हैं पत्थर. ताकि भूकंप में हिलने पर वो अलग नहीं होंगे. न ही जोड़ कभी टूटेगा, क्योंकि पत्थर आपस में एक-दूसरे से लॉक किए गए हैं—जैसे कुछ टाइलें होती हैं जो एक-दूसरे में फिट हो जाती हैं. ये भी हमारे प्राचीन शिल्पशास्त्र से आई हुई तकनीक है, लेकिन आधुनिक इंजीनियरिंग से इसे परफेक्ट किया गया. इससे पूरा ढांचा एक चट्टान जैसा मज़बूत हो जाता है.

नींव कैसे बनी समझिए
- अब आ जाइए इसके सबसे रोचक हिस्से पर- यानी नींव पर. अयोध्या की मिट्टी चुनौतीपूर्ण है. सरयू नदी के पास होने से पानी का स्तर ऊंचा है और वहां धरती की ऊपरी परत चिकनी मिट्टी की है. ऐसी मिट्टी पर भारी ढांचे अस्थिर हो सकते हैं. तो IIT चेन्नई के विशेषज्ञों ने सलाह दी कि 15 मीटर गहराई तक खुदाई करो. खुदाई में 1,32,219 क्यूबिक मीटर मिट्टी निकाली गई. फिर आर्टिफ़िशियल फ़ाउंडेशन बनाई गई.
- 14–15 मीटर मोटी रोलर-कम्पैक्टेड कंक्रीट की परत बनाई गई- यानी 14–15 मीटर RCC की नींव. ये फ़्लाई ऐश, मिट्टी और केमिकल से बनी कंक्रीट की परत है, जिसे रोलर से दबाकर सख्त किया गया है. इसकी 54 से 56 लेयर लगाई गई हैं नींव में. इसकी ‘कम्प्रेसिव स्ट्रेंग्थ’ 60 N/mm² से ज़्यादा है. मतलब ये 60 किलो वज़न प्रति वर्ग मिलीमीटर सहन कर सकती है.
- इस फ़ाउंडेशन के ऊपर 21 फ़ीट मोटी ग्रेनाइट की प्लिंथ लगाई गई है, जो इसको नमी से बचाती है. यानी ये नींव 1000 साल तक टिक सकती है. और मंदिर का लाखों टन का वज़न आसानी से सह लेगी.
- और भूकंप सहने की शक्ति तो राम मंदिर की सबसे बड़ी वैज्ञानिक उपलब्धि है. ये 8 तीव्रता के भूकंप को झेल सकता है. अनुमान ये है कि इस इलाक़े में 8 तीव्रता का भूकंप 2500 साल में एक बार आ सकता है. तो इसे ऐसा डिज़ाइन किया गया है कि 8 तीव्रता का भूकंप भी आए तो मंदिर को कुछ नहीं होगा. इसके लिए वैज्ञानिक संस्थान CSIR–CBRI ने नेपाल से अयोध्या तक के ऐतिहासिक भूकंपों का अध्ययन किया और फिर लैब में सिमुलेशन चलाया. तब ये डिज़ाइन बनाया गया.

भूकंप की कंपन झेलने की शक्ति कैसे आई
- पत्थरों की इंटरलॉकिंग भूकंप की कंपन को डिस्ट्रीब्यूट कर देती है, ताकि कंपन की ताक़त एक जगह पर सीमित न हो जाए. कोई स्टील इसमें है नहीं, इसलिए ज़ंग लगने का डर नहीं है. नींव इतनी गहरी है कि भूकंप की लहरें नीचे से भी न आ सकें. बाढ़ से बचाने के लिए प्लेटफ़ॉर्म ऊँचा और इसका ड्रेनेज सिस्टम ऐसा है कि पानी इकट्ठा नहीं होगा.
- कुल क्षेत्र 70 एकड़ है, जिसमें 70% खुला और हरा-भरा रहेगा. लार्सन एंड टूब्रो कंपनी ने इसे बनाया, टाटा कंसल्टिंग के इंजीनियरों ने 3D टेक्नॉलजी से मदद की. ख़ास बात कि हर पत्थर को नंबर देकर लगाया गया-जैसे बच्चे ब्लॉक लगाते हैं ब्लॉक वाले खिलौनों में, वैसे.
1000 साल बाद भी ये ऐसा ही भव्य खड़ा रहेगा
तो आप भी समझ लीजिए और जान लीजिए. और अगर कोई दुनिया की बड़ी-बड़ी इमारतों की बात करें तो आप गर्व से बताइए कि कैसे ये मंदिर सिर्फ़ प्राचीन ज्ञान और आधुनिक विज्ञान का संगम है. हम नहीं रहेंगे लेकिन 1000 साल बाद भी ये ऐसा ही भव्य खड़ा रहेगा और दुनिया को बताता रहेगा कि कैसे आस्था ने ये नायाब मंदिर तैयार करवाया था. ऐसे ही नहीं कहते—सब रामजी की कृपा से हुआ. सौ बात की एक बात.