गेहूं की बुवाई में गलत दूरी से घट सकता है उत्पादन… जानें 4 और 18 CM वाला ये नियम
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Wheat Farming Tips : नवंबर का महीना रबी की मुख्य फसल गेहूं की बुवाई के लिए सबसे उपयुक्त है. किसान कम लागत में अच्छा मुनाफा कमाने के लिए अगेती बुवाई कर रहे हैं. अच्छा उत्पादन लेने के लिए खेत की जुताई अच्छी तरह से करें और निर्धारित मात्रा में उपचारित बीज की ही बुवाई करें. बीज उपचार से फसल को रोगो से बचाया जा सकता है.
गेहूं की बंपर पैदावार के लिए खेत की तैयारी सबसे अहम है. किसानों को बुवाई से पहले खेत की गहरी जुताई करनी चाहिए. जुताई करने से मिट्टी भुरभुरी हो जाती है, जिससे बीज का जमाव बेहतर होता है. मिट्टी में पर्याप्त नमी होना जरूरी है. यदि खेत में नमी कम हो, तो बुवाई से पहले हल्की सिंचाई करने के बाद बुवाई करें.

किसान अपने क्षेत्र की जलवायु और मिट्टी के हिसाब से अच्छा उत्पादन देने वाली किस्मों के प्रमाणित बीज का ही चुनाव करें. अगेती बुवाई के लिए प्रति हेक्टेयर 100 किलोग्राम बीज की बुवाई करें. अगर बुवाई में देर हो रही हो, तो बीज की मात्रा बढ़ाकर 125 किलोग्राम प्रति हेक्टेयर तक करनी चाहिए. बीज की सही मात्रा से पौधों की संख्या सही रहती है, जिससे उत्पादन बढ़ता है.

बुवाई से पहले बीज उपचार करना बेहद जरूरी है. बीज उपचार करने फसल को शुरुआती दिनों में होने वाले कंडुआ और अन्य फफूंद जनित रोगों से बचाती है. किसान 1 किलोग्राम बीज को 2 से 2.5 ग्राम बाविस्टिन या कार्बेन्डाजिम से उपचारित कर सकते हैं. बीज को उपचारित करने के बाद उसे छाया में सुखाना चाहिए, फिर बुवाई करनी चाहिए.

गेहूं की बुवाई हमेशा लाइन में करनी चाहिए, जिससे निराई -गुड़ाई और सिंचाई में आसानी होती है. बीज को 4 से 5 सेंटीमीटर की निर्धारित गहराई पर बोना चाहिए. लाइन से लाइन की दूरी 18 से 18 सेंटीमीटर रखें. लाइन में बुवाई करने से प्रत्येक पौधे को पर्याप्त धूप और पोषक तत्व मिलते हैं, जिससे कल्ले अधिक निकलते हैं.

अच्छी उपज के लिए संतुलित उर्वरक प्रबंधन बहुत जरूरी है. किसानों को बुवाई के समय फॉस्फोरस और पोटाश की पूरी मात्रा के साथ-साथ नाइट्रोजन की एक-तिहाई मात्रा देनी चाहिए. उर्वरकों का प्रयोग मृदा परीक्षण के आधार पर करना सबसे बेहतर है. उर्वरक को बीज के साथ ही सीड ड्रिल बुवाई करें.

यदि किसान वैज्ञानिक ढंग से गेहूं की खेती करें, तो किसान कम लागत में गेहूं की बंपर उत्पादन ले सकते हैं. स्वस्थ और रोग-मुक्त उत्पादन होने से किसानों को बाजार में अच्छी गुणवत्ता वाली उपज का अच्छा दाम मिलता है.