गोंडा के किसान ने बदली खेती की तस्वीर, गन्ने के साथ आलू की सहफसली खेती से कमा रहे लाखों, जानें तरीका
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Gonda Latest News : गोंडा जिले के मनकापुर ब्लॉक के प्रगतिशील किसान प्रवीण कुमार सिंह ने परंपरागत खेती छोड़कर गन्ने के साथ आलू की सहफसली विधि अपनाई और कम मेहनत में अधिक लाभ कमाकर एक नई मिसाल पेश की है. करीब 10 वर्षों से इस पद्धति पर काम कर रहे किसान आज लाखों की आय कर रहे हैं और कई ग्रामीण उनके मॉडल से प्रेरित होकर सहफसली खेती की ओर बढ़ रहे हैं.
गोंडा: उत्तर प्रदेश के गोंडा जिले के मनकापुर ब्लॉक में एक किसान अपनी आधुनिक खेती पद्धति से चर्चा का केंद्र बने हुए हैं. प्रगतिशील किसान प्रवीण कुमार सिंह ने परंपरागत खेती, धान, गेहूं, मक्का, को छोड़कर वैज्ञानिक और सहफसली खेती अपनाई है. वह गन्ने की कतारों के बीच आलू की फसल लगाकर कम लागत में दुगुनी आय कमा रहे हैं. उनके इस प्रयोग से क्षेत्र के अन्य किसान भी प्रेरित हो रहे हैं.
कैसे हुई शुरुआत?
लोकल 18 से बातचीत में प्रवीण बताते हैं कि करीब 9–10 वर्ष पहले उन्होंने गन्ने की खेती शुरू की. गन्ने की पंक्तियों के बीच खाली जगह देखकर उन्होंने सोचा कि क्यों न तेजी से तैयार होने वाली फसल उगाई जाए. इसके लिए उन्होंने आलू का चयन किया. शुरू में उन्होंने केवल 1 बीघा में प्रयोग किया, लेकिन पहले ही साल उम्मीद से अधिक मुनाफा मिला. इससे प्रेरित होकर उन्होंने सहफसली खेती का क्षेत्र बढ़ाया और आज वह करीब 1 एकड़ में गन्ने के साथ आलू की खेती कर रहे हैं.
क्या है सहफसली खेती?
सहफसली खेती यानी एक ही खेत में दो फसलें एक साथ उगाना. इसमें खेत की उत्पादकता बढ़ती है और किसान को एक ही समय में दो फसलों से आमदनी मिलती है. गन्ने में शुरुआती 2–3 महीने पंक्तियों के बीच काफी खाली जगह रहती है, जिसे आलू जैसी फसलों के लिए आसानी से उपयोग किया जा सकता है. प्रवीण शाहजहांपुर की 18231 वैरायटी का गन्ना और पुखराज वैरायटी का आलू उपयोग करते हैं.
गन्ने के साथ आलू की खेती क्यों फायदेमंद?
खेत का बेहतर उपयोग:
गन्ने की कतारों के बीच बची जगह आलू खेती के लिए बिल्कुल उपयोगी होती है, जिससे खेत का कोई हिस्सा खाली नहीं रहता.
कम लागत – ज्यादा लाभ:
गन्ने की मिट्टी में नमी पहले से होती है, इसलिए आलू की लागत काफी घट जाती है.
गन्ने की बढ़वार पर असर नहीं:
आलू 70–90 दिनों में तैयार हो जाता है, जिससे गन्ने की बढ़त प्रभावित नहीं होती.
दोहरी आमदनी:
पहले आलू बिकता है, जिससे तुरंत कमाई होती है. बाद में गन्ना बेचा जाता है और बड़ी आय होती है.
किसान की सफलता की कहानी
प्रवीण बताते हैं कि पारंपरिक खेती में लागत बढ़ गई थी और मुनाफा घट रहा था. सहफसली खेती अपनाने के बाद न सिर्फ उनकी आय बढ़ी, बल्कि जोखिम भी कम हो गया. अब उनकी सालाना आय लाखों में पहुंच चुकी है और आसपास के गांवों के किसान भी इस मॉडल से प्रेरित होकर इसे अपना रहे हैं.