जब अंग्रेजों ने रोकी होली, तब शुरू हुआ कानपुर का गंगा मेला; आज भी जिंदा है 1942 की परंपरा
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History of Kanpur Ganga Mela: कानपुर में होली का रंग सिर्फ एक दिन नहीं रहता. होली के दिन से लेकर गंगा मेला तक शहर में रोज रंग खेला जाता है. बच्चे, युवा और बुजुर्ग सभी इस उत्सव में पूरे उत्साह के साथ शामिल होते है. गंगा मेला के दिन तो पूरा शहर जैसे रंगों में डूब जाता है. सरसैया घाट के आसपास हजारों लोग पहुंचते है और एक-दूसरे को अबीर-गुलाल लगाकर होली की शुभकामनाएं देते है.
Kanpur Ganga Mela: कानपुर में होली का रंग सिर्फ एक दिन का नहीं रहता, बल्कि यह कई दिनों तक चलता है. देशभर में लोग होली के दिन अबीर-गुलाल लगाकर त्योहार मनाते हैं, लेकिन कानपुर में होली की एक अनोखी परंपरा है. यहां होली के बाद गंगा मेला का आयोजन होता है. जिसे शहर की दूसरी होली भी कहा जाता है. कानपुर में गंगा मेला की परंपरा करीब 85 साल पुरानी है. इसकी शुरुआत 1942 में अंग्रेजों के दौर में हुई थी. उस समय हटिया बाजार के कुछ नवयुवकों ने तय किया कि वे पूरे उत्साह के साथ होली खेलेंगे. लेकिन उस समय कानपुर के जिलाधिकारी रहे अंग्रेज अफसर मि. लुईस ने होली खेलने पर पाबंदी लगा दी. यह फैसला युवाओं को बिल्कुल पसंद नहीं आया. उन्होंने तय किया कि चाहे कुछ भी हो जाए होली जरूर खेली जाएगी. होली के दिन जब युवक रंग खेल रहे थे तभी कोतवाल पुलिस फोर्स के साथ वहां पहुंचे और कई युवकों को गिरफ्तार कर लिया.
जैसे ही युवकों की गिरफ्तारी की खबर शहर में फैली माहौल गर्म हो गया. शहर के कई इलाकों से लोग हटिया पहुंचने लगे. होरियारों की भीड़ जमा हो गई और सभी ने एकजुट होकर ऐलान किया कि जब तक गिरफ्तार युवकों को छोड़ा नहीं जाएगा तब तक रंग खेलना जारी रहेगा. मामला धीरे-धीरे बड़ा होता गया और इसकी खबर अंग्रेजी हुकूमत तक पहुंच गई. लोगों का गुस्सा लगातार बढ़ रहा था. आजादी की लड़ाई का समय भी था. इसलिए अंग्रेज सरकार को डर था कि यह विरोध बड़ा आंदोलन न बन जाए. आखिरकार गवर्नर ने आदेश दिया कि गिरफ्तार युवकों को रिहा कर दिया जाए. अंग्रेज अधिकारियों ने युवकों को सरसैया घाट के पास लाकर गंगा में छोड़ दिया. उसी दिन से कानपुर में गंगा मेला की शुरुआत हुई.
10 मार्च को मनाया जाएगा गंगा मेला
कानपुर हटिया होली मेला महोत्सव समिति के अध्यक्ष ज्ञानेंद्र विश्नोई बताते है कि गंगा मेला अब शहर की पहचान बन चुका है. इस दिन हटिया स्थित रज्जन बाबू पार्क से एक अनोखा जुलूस निकलता है जिसे “भैंसा ठेला” कहा जाता है. इस ठेले में रंगों से भरे ड्रम और पिचकारियां रखी जाती है. इसके पीछे-पीछे ऊंट, घोड़े, ट्रैक्टर और युवाओं के वाहन चलते है. हजारों लोग रंगों में सराबोर होकर नाचते-गाते हुए जुलूस के साथ आगे बढ़ते है. यह जुलूस शहर की गलियों से होते हुए सरसैया घाट पहुंचता है. वहां सभी लोग गंगा स्नान करते है और एक-दूसरे को रंग लगाकर होली की बधाई देते है. इस बार यह गंगा मेला कानपुर महानगर में 10 मार्च को मनाया जा रहा है, जिसको लेकर तैयारियां जोरों-शोरों से चल रही है.
पूरा शहर जैसे रंगों में डूब जाता
कानपुर में होली का रंग सिर्फ एक दिन नहीं रहता. होली के दिन से लेकर गंगा मेला तक शहर में रोज रंग खेला जाता है. बच्चे, युवा और बुजुर्ग सभी इस उत्सव में पूरे उत्साह के साथ शामिल होते है. गंगा मेला के दिन तो पूरा शहर जैसे रंगों में डूब जाता है. सरसैया घाट के आसपास हजारों लोग पहुंचते है और एक-दूसरे को अबीर-गुलाल लगाकर होली की शुभकामनाएं देते है. यही वजह है कि कानपुर की यह परंपरा पूरे देश में अलग पहचान रखती है. यहां की होली सिर्फ एक त्योहार नहीं, बल्कि इतिहास, परंपरा और उत्साह का अनोखा संगम है.
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काशी के बगल चंदौली से ताल्लुक रखते है. बिजेनस, सेहत, स्पोर्टस, राजनीति, लाइफस्टाइल और ट्रैवल से जुड़ी खबरें पढ़ना पसंद है. मीडिया में करियर की शुरुआत ईटीवी भारत हैदराबाद से हुई. अभी लोकल18 यूपी के कॉर्डिनेटर की…और पढ़ें