जहां मृत्यु भी मानी जाती है आनंद… क्यों काशी को कहते हैं ‘आनंदवन’, जानिए कहानी
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वाराणसी, जिसे काशी और बनारस के नाम से भी जाना जाता है, दुनिया के सबसे प्राचीन और आध्यात्मिक शहरों में गिना जाता है. इस नगरी का एक प्राचीन नाम आनंदवन या आनंद कानन भी बताया जाता है. पौराणिक मान्यताओं के अनुसार भगवान शिव और माता पार्वती इस स्थान की दिव्यता से प्रभावित होकर यहां निवास करने लगे थे, जिसके कारण इस नगरी को आनंदवन कहा जाने लगा.
वाराणसी. बनारस दुनिया के प्राचीनतम शहरों में से एक है. वैसे तो इस शहर को काशी और वाराणसी के नाम से भी जाना जाता है. इस शहर का एक और प्राचीन नाम ‘आनंदवन’ है. जिसे कहीं-कहीं ‘आनंद कानन’ भी कहा जाता है. इसके पीछे भगवान शिव और माता पार्वती से जुड़ी पौराणिक कथा भी है, जो बेहद दिलचस्प है.
कथाओं के अनुसार, प्राचीन समय में यह स्थान कुश के जंगलों पर बसा था जिसके प्रकाश की रोशनी ब्रह्मण्ड तक चमकती थी. भगवान शिव और पार्वती कैलाश छोड़ ब्रह्मण्ड का भ्रमण कर रहें थे. इसी दौरान वो इस प्रकाशकुंज को देख प्रभावित हुए. फिर भगवान शिव और माता पार्वती ने यहां रहने का मन बनाया. वो खुशी-खुशी इस नगर में बसे इसी कारण इसका नाम ‘आंनद वन’ या ‘आनंद कानन’ पड़ा. कैलाश के अलावा पूरे ब्रह्मांड में सिर्फ यही एक स्थान है जो भगवान शिव और माता पार्वती को अतिप्रिय है.
परम आंनद की होती है अनुभूति
यहां रहने वाले मनुष्य भी परम आनंद की अनुभूति करते हैं. यहां खुद से ज्यादा लोग दूसरों को सम्मान देते है. बीएचयू के रिटार्यड प्रोफेसर मारुति नंदन तिवारी ने बताया कि आज भी यहां लोग रिक्शे वालों को बड़े ही प्रेम से ‘का गुरु’, का मालिक जैसे शब्दों से संबोधित करते है.
भगवान शिव ने दिया था नाम
स्कन्दपुराण के अनुसार, भगवान शिव ने ही इस नगरी को सबसे पहले आनंदवन का नाम दिया था. क्योंकि वो इस स्थान पर आनंद पूर्वक वास किए थे. ऐसी धार्मिक मान्यता है कि आज भी इस शहर में स्वयं भगवान शिव वास करतें है. यही कारण है कि इसे अविमुक्त क्षेत्र भी कहा जाता है. यहां द्वादश ज्योतिर्लिंगों में प्रमुख श्री काशी विश्वनाथ का मंदिर भी है.
भगवान शिव देते है तारक मंत्र
काशी में स्वयं मृत्यु भी आनंद है क्योंकि यहां मरने वालों के कान में भगवान शिव तारक मंत्र देतें है. जिससे मृतक आत्मा को मोक्ष की प्राप्ति होती है. जो परम आनंद का प्रतीक है. पूरी दुनिया में एकमात्र ये ही एक ऐसा शहर है जो भगवान शिव के त्रिशूल पर बसा हुआ है. इतना ही नहीं यहां गंगा भी उत्तर वाहिनी है.
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