झांसी का कोछाभावर गांव, जहां फ्रिज भी फीका, मिट्टी के मटकों में मिलती है प्राकृतिक ठंडक!

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झांसी का कोछाभावर गांव, जहां फ्रिज भी फीका, मिट्टी के मटकों में मिलती है प्राकृतिक ठंडक!


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झांसी का कोछाभावर गांव अपने मिट्टी के मटकों के लिए दूर-दूर तक प्रसिद्ध है, जो तेज गर्मी में पानी को प्राकृतिक रूप से ठंडा रखते हैं. पीढ़ियों से कारीगर इस परंपरा को निभाते आ रहे हैं और यहां के मटकों का पानी सेहत के लिए भी फायदेमंद माना जाता है. गर्मी बढ़ते ही इस गांव के मटकों की मांग देशभर से बढ़ जाती है.

झांसी. इस बार गर्मी ने जल्दी दस्तक दे दी है, तेज धूप से लोग परेशान दिख रहे हैं. ऐसे समय में कोछाभावर गांव का नाम फिर चर्चा में है. यह गांव अपने मिट्टी के मटकों के लिए दूर दूर तक जाना जाता है. यहां के मटके पानी को ठंडा रखते हैं. लोग कहते हैं कि इन मटकों का पानी पीने से शरीर को राहत मिलती है. गांव की गलियों में हर घर के बाहर मटके रखे दिखते हैं, यहां के कारीगर पीढ़ियों से यही काम करते आ रहे हैं. उनका हुनर इस गांव की पहचान बन चुका है, कोछाभावर गांव को लेकर एक कहावत भी बहुत मशहूर है. इस गांव के बने हुए मटके कभी न चटके, पानी पियो डटके. यह कहावत यहां के लोगों के विश्वास को दिखाती है. गांव के बुजुर्ग बताते हैं कि पहले के समय में भी लोग यही मटके इस्तेमाल करते थे. उस समय कोई फ्रिज नहीं था, फिर भी पानी हमेशा ठंडा रहता था, आज भी वही परंपरा जारी है. मिट्टी की खुशबू से भरा पानी लोगों को खास अनुभव देता है. शहर के लोग भी यहां से मटके खरीदने आते हैं. देश के कोने कोने से आने वाले लोग इस गांव की मिट्टी से बने मटके जमकर खरीदते हैं.

मटके का पानी सेहत के लिए अच्छा 

गांव के एक कारीगर मोहन कहते हैं कि हम बचपन से यह काम कर रहे हैं, हमारे पिता भी यही करते थे. हम मिट्टी को अच्छी तरह गूंथते हैं. फिर उसे आकार देते हैं, धूप में सुखाते हैं, उसके बाद आग में पकाते हैं, तब जाकर मटका तैयार होता है. वह कहते हैं कि हमारी मिट्टी में खास बात है, यही वजह है कि पानी ज्यादा ठंडा रहता है. एक महिला गीता कहती हैं कि हम रोज इसी मटके का पानी पीते हैं, इससे हमें ठंडक मिलती है, शरीर भी ठीक रहता है. आज के समय में लोग फ्रिज का पानी पीते हैं, फिर भी मिट्टी के मटके की बात अलग है. डॉक्टर भी कहते हैं कि मटके का पानी सेहत के लिए अच्छा होता है, इसमें कोई नुकसान नहीं होता है. गांव के लोग बताते हैं कि इस पानी से गला भी ठीक रहता है. पेट में भी दिक्कत कम होती है, यहां आने वाले लोग मटके का पानी पीकर खुश हो जाते हैं. उन्हें बचपन की याद आ जाती है, इस गांव का नाम इसी वजह से दूर तक फैल गया है. कोछाभावर गांव के लोग अपने काम पर गर्व करते हैं. उनका कहना है कि हम अपनी परंपरा को जिंदा रखेंगे, चाहे समय कितना भी बदल जाए. यहां के बच्चे भी यह काम सीख रहे हैं, ताकि आगे भी यह कला बनी रहे. गर्मी के दिनों में यहां मटकों की मांग बढ़ जाती है, लोग दूर दूर से खरीदने आते हैं. इस गांव का हर मटका मेहनत का नतीजा होता है. यही वजह है कि कोछाभावर का नाम खास बन चुका है.

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Monali Paul

नमस्ते मेरा नाम मोनाली है, पेशे से पत्रकार हूं, ख़बरें लिखने का काम है. लेकिन कैमरे पर समाचार पढ़ना बेहद पसंद है. 2016 में पत्रकारिता में मास्टर्स करने के बाद पांच साल कैमरे पर न्यूज़ पढ़ने के साथ डेस्क पर खबरे…और पढ़ें



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