झांसी की शान: इतिहास के पन्नों में अमर महारानी लक्ष्मीबाई और उनके निष्ठावान तोपची गुलाम गौस खां की वीर गाथा!
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झांसी की महारानी लक्ष्मीबाई और उनके प्रमुख तोपची गुलाम गौस खां की जोड़ी साहस और विश्वास की जीवंत मिसाल थी. गुलाम गौस खां ने अपनी अचूक निशानेबाजी और वीरता से झांसी की रक्षा की, अंग्रेजों को कई बार पराजित किया और हर युद्ध में रानी के भरोसे पर खरा उतरे. उनके साहस और निष्ठा ने इतिहास में अमर छवि बनाई, जो आज भी वीरता और देशभक्ति का प्रतीक मानी जाती है.
झांसी. महारानी लक्ष्मीबाई की वीरता के चर्चे इतिहास के पन्नों में अमर हो गए है. ब्रिटिश हुकूमत के खिलाफ झांसी की महारानी लक्ष्मीबाई ने एक ऐसे शख्स की मदद से कई बड़े युद्ध लड़े. इसी शख्स की मदद से झांसी की महारानी लक्ष्मीबाई ने ब्रिटिश हुकूमत को कई बार युद्ध में पराजित किया. किसी भी युद्ध को लड़ने से पहले झांसी की महारानी लक्ष्मीबाई उससे हमेशा युद्ध लड़ने के तौर-तरीकों के बारे में जानकारी लेती थी. झांसी की महारानी लक्ष्मीबाई ने अपने इस बेहद खास सिपहसालार पर हमेशा खुद से भी ज्यादा भरोसा किया और इस सिपहसालार ने अपनी अचूक निशानेबाजी से हमेशा अपनी महारानी का दिल जीता. इतिहास भी महारानी लक्ष्मीबाई के इस बेहद खास तोपची, गुलाम गौस खां की अचूक निशानेबाजी की जमकर तारीफ करता है.
झांसी की महारानी लक्ष्मीबाई और उनके प्रमुख तोपची गुलाम गौस खां की जोड़ी अद्भुत थी, गुलाम गौस खां झांसी राज्य के ही निवासी थे. बचपन से ही गुलाम गौस खां तोप चलाने में बहुत निपुण थे. तोप की आवाज और उसकी दिशा को वे बहुत अच्छे से समझते थे. गुलाम गौस झांसी की सेना में सबसे भरोसेमंद योद्धा माने जाते थे. महारानी लक्ष्मीबाई उन पर बहुत विश्वास करती थी, इसका कारण था उनका साहस और ईमानदारी. गुलाम गौस खां कभी डरते नहीं थे और हमेशा युद्ध में सबसे आगे रहते थे. उनका निशाना बहुत अचूक था और वे दूर से ही दुश्मन की तोप को नष्ट कर देते थे. उनकी आंखें तेज थी और मन हमेशा शांत रहता था. तोप चलाने से पहले वे बहुत ध्यान लगाते थे, झांसी की महारानी लक्ष्मीबाई के एकमात्र विश्वासपात्र तोपची गुलाम गौस खां का निशाना कभी खाली नहीं जाता था.
दुश्मन को पास नहीं आने देते थे
जब भी युद्ध होता था, गुलाम गौस रानी के पास ही रहते थे और दुश्मन को पास नहीं आने देते थे, इसलिए रानी उन पर पूरा भरोसा करती थी. अंग्रेजी हुकूमत के खिलाफ गुलाम गौस ने कई युद्ध लड़े और झांसी के किले की रक्षा की. उन्होंने अंग्रेज सैनिकों पर लगातार तोप से वार किया, जिसके कारण अंग्रेज सेना को कई बार भारी नुकसान हुआ. जब अंग्रेज झांसी पर हमला कर रहे थे, तब गुलाम गौस ने दिन-रात तोप चलाई, न कभी थके और न रुके. मुख्य तोपची का एकमात्र उद्देश्य था कि अंग्रेजी हुकूमत के आक्रमण से सिर्फ झांसी को बचाना है. अपने अंतिम युद्ध के दौरान गुलाम गौस वीरगति को प्राप्त हुए, महारानी लक्ष्मीबाई को अपने मुख्य तोपची के युद्ध में मारे जाने की खबर सुनकर बड़ा सदमा लगा. गुलाम गौस केवल एक तोपची नहीं थे, बल्कि झांसी की शान थे. वे ब्रिटिश हुकूमत के खिलाफ भारत की आजादी के सच्चे सिपाही थे. आज भी उनका नाम साहस और विश्वास की मिसाल के रूप में इतिहास में पढ़ा और याद किया जाता है.
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