पढ़ाई के बाद नहीं मिली सरकारी नौकरी, अरहर की खेती में आजमाया किस्मत, बन गए लखपति
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राधेश्याम बताते हैं कि उन्होंने शुरू में छोटे स्तर पर अरहर की खेती की थी. लेकिन जब उन्हें अच्छा उत्पादन और सही दाम मिला, तो उन्होंने धीरे-धीरे इसकी खेती बढ़ा दी. अब वह अरहर की खेती से अच्छी कमाई कर रहे हैं और दूसरे किसानों के लिए भी प्रेरणा बन गए हैं. अरहर की खेती ज्यादा खर्चीली नहीं होती. इसमें खाद और दवाइयों का खर्च कम आता है, जिससे किसान की लागत भी कम रहती है. साथ ही, इस फसल की देखभाल भी ज्यादा मुश्किल नहीं होती.
गोंडा: विकासखंड पंडरी कृपाल के एक किसान ने पारंपरिक खेती के साथ-साथ अरहर (तूर दाल) की खेती शुरू करके अच्छी आमदनी हासिल की है. जहां कई किसान गेहूं-धान की खेती तक ही सीमित रहते हैं, वहीं इस किसान ने कुछ नया करने की सोच रखी और अरहर की खेती को अपनाया. अब उनकी मेहनत रंग ला रही है और उन्हें अच्छा फायदा मिल रहा है.
लोकल 18 से बातचीत के दौरान प्रगतिशील किसान राधेश्याम दुबे का कहना है कि अरहर की खेती ज्यादा खर्चीली नहीं होती और इसकी देखभाल भी आसान होती है. सही समय पर बुवाई और थोड़ी सी देखरेख से अच्छी पैदावार मिल जाती है. उन्होंने बताया कि अरहर की फसल लगभग 9 से 10 महीने में तैयार हो जाती है.
प्रयास के बाद नहीं मिली सरकारी नौकरी
राधेश्याम दुबे बताते हैं कि उन्होंने इंटर तक की पढ़ाई की है. उसके बाद उन्होंने गवर्नमेंट नौकरी के लिए काफी प्रयास किया लेकिन कुछ कारण बस उनको गवर्नमेंट नौकरी नहीं मिल पाई फिर उन्होंने अपनी किस्मत खेती किसानी में अजमाई. और वह इस समय अरहर की खेती कर रहे हैं. बताते हैं कि अरहर की खेती का आईडिया हमको अरहर की खेती का आईडिया पानी संस्थान द्वारा मिला है पहले हम पारंपरिक तरीके से खेती करते थे फिर पानी संस्थान द्वारा हमको बताया गया कि अरहर की खेती बेड विधि से करें और उसके साथ हमने मक्का लगाया था और हमारा मक्का से लागत निकल आया है और सारा इनकम अरहर की फसल से होगी.
कम खर्च ज्यादा मुनाफा
राधेश्याम बताते हैं कि उन्होंने शुरू में छोटे स्तर पर अरहर की खेती की थी. लेकिन जब उन्हें अच्छा उत्पादन और सही दाम मिला, तो उन्होंने धीरे-धीरे इसकी खेती बढ़ा दी. अब वह अरहर की खेती से अच्छी कमाई कर रहे हैं और दूसरे किसानों के लिए भी प्रेरणा बन गए हैं. अरहर की खेती ज्यादा खर्चीली नहीं होती. इसमें खाद और दवाइयों का खर्च कम आता है, जिससे किसान की लागत भी कम रहती है. साथ ही, इस फसल की देखभाल भी ज्यादा मुश्किल नहीं होती. सही समय पर बुवाई और थोड़ी सी निगरानी से अच्छी पैदावार मिल जाती है. उन्होंने बताया कि इस खेती में लागत कम लगती है और मुनाफा अधिक होता है.
अरहर की बुवाई जून-जुलाई के महीने में की जाती है और यह फसल लगभग 9 से 10 महीने में तैयार हो जाती है. फसल तैयार होने के बाद इसकी बाजार में अच्छी मांग रहती है, जिससे किसानों को अच्छा दाम मिलता है. खास बात यह है कि दाल की कीमत हमेशा स्थिर रहती है, जिससे किसानों को नुकसान होने की संभावना कम रहती है.
एक एकड़ में 6 हजार लागत
राधेश्याम दुबे ने बताया कि अरहर की खेती मिट्टी की उर्वरता (फर्टिलिटी) बढ़ाने में भी मदद करती है. यह फसल जमीन में नाइट्रोजन की मात्रा बढ़ाती है, जिससे अगली फसल को भी फायदा होता है. इस तरह यह खेती न सिर्फ मुनाफा देती है, बल्कि जमीन के लिए भी फायदेमंद होती है. लगभग आधे एकड़ में अरहर की खेती कर रहे हैं. अरहर की खेती में लागत लगभग 5 हजार रुपए की लागत लगी है. उन्होंने बताया कि 2 किलो अरहर के बीच की बुवाई किए थे और अरहर में पानी काम देना पड़ता है और देखभाल भी कम करनी पड़ती इसीलिए इसमें लागत कम लगती है और मुनाफा अधिक होता है. इस बार अरहर की खेती से लगभग 70 से 80 हजार रुपए की इनकम होने की उम्मीद है.
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मैं रजनीश कुमार यादव, 2019 से पत्रकारिता से जुड़ा हूं. तीन वर्ष अमर उजाला में बतौर सिटी रिपोर्टर काम किया. तीन वर्षों से न्यूज18 डिजिटल (लोकल18) से जुड़ा हूं. ढाई वर्षों तक लोकल18 का रिपोर्टर रहा. महाकुंभ 2025 …और पढ़ें