बैरक टूटे, कूड़े लगे ढेर..खंडहर में तब्दील हुई आजमगढ़ की यह ऐतिहासिक जेल, आजादी की रही गवाह
आजमगढ़. यूपी के आजमगढ़ जिले में पौराणिक और ऐतिहासिक दृष्टि से कई महत्वपूर्ण स्थल मौजूद हैं, जो जिले के इतिहास को अपने अंदर समेटे हुए हैं. इसी तरह शहर कोतवाली से तकरीबन 200 मीटर की दूरी पर एक ऐसी ही ऐतिहासिक इमारत है, जिसकी हर ईट में भारत के आजादी के संघर्षों का इतिहास छुपा है, लेकिन भारत के आजादी की पहली चिंगारी के गौरवशाली इतिहास को अपने अंदर संजोई हुए यह जगह कूड़े के ढेर और खंडहर के बीच में संघर्ष कर रही है, हम बात कर रहे हैं जनपद के पुराने जिला कारागार की, जो कभी क्रांतिकारियों के साहस और ब्रिटिश हुकूमत से लोहा लेने का प्रतीक था, लेकिन आज प्रशासनिक उपेक्षा का शिकार है.
क्रांतिकारियों ने किया था जेल पर हमला
इतिहासकारों के अनुसार इस कारागार का निर्माण जिले की स्थापना के साथ ही हुआ था. 1857 के प्रथम स्वतंत्रता संग्राम की लड़ाई में आजमगढ़ जिले की भूमिका अत्यंत महत्वपूर्ण रही थी, उस दौरान अंग्रेजों के खिलाफ विद्रोह की ज्वाला पूरे देश भर में भड़की, जिसका असर आजमगढ़ में भी था. तत्कालीन समय में यह जगह अंग्रेजों की जेल के रूप में उपयोग की जाती थी, आजादी के प्रथम विद्रोह के दौरान जिले के क्रांतिकारियों ने इस जेल पर भी धावा बोल दिया था. 3 जून 1857 को जगबंदन सिंह की गिरफ्तारी के बाद रज्जब अली और उनके क्रांतिकारी साथियों ने आजमगढ़ जेल पर हमला कर दिया और जेल का फाटक तोड़कर बंद सभी साथियों को छुड़ा लिया था. इस संघर्ष में कई अंग्रेजी अफसरों को भी मौत की नींद सुला दिया था.
81 दिनों तक ब्रिटिश हुकूमत से रहा मुक्त
वीर कुंवर सिंह जैसे महानायकों के साथ लड़े गए आजादी के इस प्रथम संघर्ष में आजमगढ़ जनपद तकरीबन 81 दिनों तक ब्रिटिश हुकूमत से मुक्त रहा था. तत्कालीन समय के अंग्रेजी कारावास से लेकर अंग्रेजों के कंपनी बाग तक को आजमगढ़ के क्रांतिकारी ने अपने कब्जे में ले लिया था. लेकिन आज की विडंबना यह है कि जिस जगह ने कभी देश की आजादी के मतवालों को अपने दीवारों के बीच में पनाह दी थी, जहां पर कई क्रांतिकारी के साथ-साथ जनपद के अपराधियों ने अपनी गुनाहों की सजा काटी थी, आज वही जगह अनदेखी की सजा काटने पर मजबूर है.
खंडहर और कूड़े में तब्दील होता इतिहास
आज यह जगह खंडहर और कूड़े के ढेर के बीच में दफन होती जा रही है, जहां पर कभी जेलरों के द्वारा कैदियों को उनके गुनाहों की सजा दी जाती थी. आज वहां की बैरकें गिर रही हैं और पूरा परिसर कूड़े के ढेर और झाड़ियों के बीच में दफन होता जा रहा है. वर्तमान में इस जगह का उपयोग नगर पालिका के द्वारा अस्थाई रूप से शहर के कचरे को डंप करने के लिए किया जाता है. शहर कोतवाली से इतने पास होने के बावजूद जिला प्रशासन की आंखों के सामने यह ऐतिहासिक धरोहर अपनी पहचान खो रहा है. इस जेल की पुरानी दीवारें और गेट जो कभी अभेद्य हुआ करते थे, अब ढहने के कगार पर हैं.
प्रशासनिक कशमकश के बीच पहचान खोती जगह
हालांकि साल 2016 में शहर मुख्यालय से तकरीबन 10 किलोमीटर की दूरी पर इटौरा में नया एवं आधुनिक कारागार बनाया गया है, जहां पर कैदियों को शिफ्ट किया गया, उसके बाद से ही इस जगह पर सामाजिक संगठनों एवं स्थानीय लोगों के द्वारा पार्क बनाए जाने की मांग की जा रही थी. जिसके लिए तत्कालीन समय में जनपद के जिलाधिकारी के द्वारा धनराशि भी स्वीकृत की गई थी, लेकिन कारागार निदेशालय की आपत्ति पर नगर पालिका को जमीन हैंडोवर नहीं हो सकी. इसके बाद से इस जगह पर स्टेडियम और मल्टी लेवल पार्किंग बनाए जाने की भी बात सामने आई थी, लेकिन यह सारी बातें केवल चर्चा तक ही सीमित रही नतीजतन यह ऐतिहासिक जगह आज प्रशासनिक कशमकश के बीच कूड़े के ढेर में तब्दील होते हुए अपनी पहचान खोती जा रही हैं.