महराजगंज का निचलौल क्षेत्र जहां आज भी जीवित है राजा रत्नसेन की विरासत, जानिए क्या कहता है
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महराजगंज जिले का निचलौल क्षेत्र अपने समृद्ध इतिहास और राजा रत्नसेन की विरासत के लिए जाना जाता है. 1857 की क्रांति के दौरान राजा ने अंग्रेजों के खिलाफ विद्रोह किया, जिसके बाद अंग्रेजों ने उनका किला ध्वस्त कर दिया. आज भी घोड़हवा बाजार, कोट मोहल्ला और अन्य स्थानों में उस दौर के अवशेष मौजूद हैं, जो इस क्षेत्र के गौरवशाली अतीत की कहानी बयान करते हैं.
महराजगंज. वन संपदा से समृद्ध यह जिला अपने भौगोलिक स्थिति के साथ-साथ अपने ऐतिहासिक मान्यताओं और महत्व के लिए भी लोकप्रिय है. जिले के अलग-अलग क्षेत्र का अपना इतिहास रहा है जो लोगों के बीच आज भी चर्चा का विषय रहता है. महराजगंज जिले के भारत नेपाल सीमा से थोड़ी सी दूरी पर मौजूद निचलौल क्षेत्र का इतिहास बेहद खास रहा है. इस क्षेत्र को इतिहास के एक कुशल नेतृत्व करता रहे राजा रत्नसेन की विरासत से जोड़कर देखा जाता है. इसके साथ ही इस क्षेत्र में राजा रत्नसेन से जुड़ी बहुत सी कहानी प्रचलित हैं और अलग-अलग हिस्सों में बहुत सी ऐसी चीज देखने को मिलती है जो तत्कालीन इतिहास को प्रदर्शित करती हैं. निचलौल में ही राजा रत्नसेन इंटरमीडिएट कॉलेज भी संचालित होता है जो जिले के पुराने विद्यालयों में से एक है.
अंग्रेजों के खिलाफ राजा ने कर दिया था विद्रोह
राजा रत्नसेन इंटरमीडिएट कॉलेज के अलावा राम जानकी मंदिर और अन्य कई ऐसे विरासत हैं जो इस क्षेत्र को राजा रत्नसेन से जोड़ती हैं. इतिहासकार डॉ. बृजेश पांडे बताते हैं कि राजस्थान के एक राजा रत्नसेन के नाम से यहां के राजा का नाम भी रत्नसेन पड़ा. 1857 की क्रांति के समय जो यहां के राजा थे वह रंडोल सेन थे. इस क्रांति के समय यहां के राजा जो शासन कर रहे थे उन्होंने अंग्रेजों के खिलाफ विद्रोह शुरू कर दिया. यहां के तत्कालीन कमिश्नर ने इसकी सूचना अंग्रेजों को दे दी और अंग्रेजों की सेना और गोरखों की सेना यहां आ गई. इसके बाद इस क्षेत्र में जितने भी क्रांतिकारी थे उनके ऊपर बहुत दबाव बन गया. राजा को जब इस बात की सूचना मिली कि अंग्रेजों और गोरखों की सेना यहां आ चुकी है तो उन्होंने अपना किला छोड़ किसी जमींदार के यहां शरण ले ली. इसके बाद अंग्रेजों ने उनके किले को ध्वस्त कर दिया और बाद में राजा का परिवार गुमनामी की जिंदगी के साथ यहां के सत्ता से खत्म हो गया.
आज भी मौजूद हैं राजा से जुड़े अवशेष
इतिहासकार डॉ. बृजेश पांडे बताते हैं कि भले ही अंग्रेजों ने राजा के किले को ध्वस्त कर दिया, लेकिन उनके अवशेष आज भी मौजूद हैं. ऐसा माना जाता है कि निचलौल बाजार से थोड़ी ही दूरी पर स्थित घोड़हवा बाजार है जो तत्कालीन समय में राजा के घोड़ों का ठिकाना था. राजा की सेना खासकर जो घुड़सवार सेना थी यहां पर रहती थी. इसी तरह इस क्षेत्र में एक कोट मोहल्ला है ऐसा माना जाता है कि यहां पर राजा के समय में राजा का कोर्ट लगा करता था. इसके साथ ही अन्य कई प्रमाण यहां पर देखने को मिलते हैं जो इस क्षेत्र का संबंध राजा से स्थापित करते हैं.
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नमस्ते मेरा नाम मोनाली है, पेशे से पत्रकार हूं, ख़बरें लिखने का काम है. लेकिन कैमरे पर समाचार पढ़ना बेहद पसंद है. 2016 में पत्रकारिता में मास्टर्स करने के बाद पांच साल कैमरे पर न्यूज़ पढ़ने के साथ डेस्क पर खबरे…और पढ़ें