यूपी में यहां औरंगजेब के जमाने से चल रहे कोल्हू, बनता है खास गुड़, उत्तराखंड से लेकर बिहार तक है मशहूर
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Rampur News: रामपुर के दढ़ियाल में पारंपरिक तरीके से बनने वाला गुड़ बिहार, उत्तराखंड और यूपी के कई जिलों में मशहूर है. यहां 15 कोल्हुओं पर रोज 7–8 क्विंटल शुद्ध गुड़ तैयार होता है. स्थानीय कारीगरों का कहना है कि दढ़ियाल में गुड़ बनाने की परंपरा औरंगज़ेब के समय से चली आ रही है.
रामपुर के दढ़ियाल नगर पंचायत क्षेत्र में बनने वाला गुड़ अपनी खास मिठास, शुद्धता और पारंपरिक तरीकों से तैयार होने के कारण बिहार, उत्तराखंड और उत्तर प्रदेश के कई जिलों तक मशहूर है. यहां की गुड़ निर्माण कला पीढ़ी-दर-पीढ़ी विरासत के रूप में चली आ रही है, जो आज भी इस क्षेत्र की पहचान बनी हुई है. दढ़ियाल में सर्दियों का मौसम आते ही कोल्हू की लगातार चलती चर्र-चर्र और उबलते रस की महक पूरे इलाके में रौनक भर देती है.
स्थानीय व्यापारी अनवर बताते हैं कि दढ़ियाल में इस समय करीब 15 कोल्हू सक्रिय हैं और हर कोल्हू पर लगभग 50 मजदूर दिन-रात मेहनत करते हैं. उन्होंने बताया कि आजादी से पहले से ही यहां बड़े पैमाने पर गुड़ बनता आया है. पारंपरिक तरीके से गन्ने का रस निकालकर उसे तीन लेयर वाली खास भट्ठी में छानने और लगातार उबालने की प्रक्रिया के बाद गाढ़ा तरल तैयार किया जाता है. इसके बाद इस रस को गर्म अवस्था में चाक पर उतारकर भेली के आकार में ढाला जाता है.
अनवर के अनुसार, 12 क्विंटल गन्ने से करीब 70 किलो गुड़ बनकर तैयार होता है. एक बार की प्रक्रिया में लगभग ढाई घंटे का समय लगता है. दढ़ियाल का गुड़ पूरी तरह देशी और शुद्ध गुणवत्ता वाला होता है, जिसे 40 रुपये प्रति किलो की दर से बेचा जाता है. यहां से रोजाना 7 से 8 क्विंटल गुड़ तैयार होकर बाजार में भेजा जाता है, जिसके लिए करीब 70 क्विंटल गन्ने की आवश्यकता पड़ती है.
दढ़ियाल के गुड़ की ऐतिहासिक परंपरा के बारे में जुल्फिकार ठेकेदार बताते हैं कि पहले यहां करीब 160 कोल्हू चलते थे. उनके बुजुर्गों से मिली जानकारी के अनुसार, दढ़ियाल में गुड़ बनाने की शुरुआत औरंगज़ेब के समय से मानी जाती है.