लहसुन की कली कैसे बन जाती है हरी-भरी फसल? राज़ छुपा है सही बुवाई में!
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लहसुन की खेती शुरू करने से पहले किसानों के लिए इससे जुड़ी कुछ जरूरी बातों की जानकारी होना बेहद आवश्यक है, ताकि किसी भी तरह के नुकसान से बचा जा सके. विशेषज्ञों के मुताबिक लहसुन की फसल 120 से 150 दिनों में तैयार हो जाती है. यदि सिंचाई, देखभाल और रोग नियंत्रण समय पर और सही तरीके से किया जाए, तो किसान हरी-भरी और बेहतरीन क्वालिटी वाली लहसुन की उपज आसानी से प्राप्त कर सकते हैं.
लहसुन रबी मौसम की एक महत्वपूर्ण फसल है, जो मसाले के रूप में ही नहीं बल्कि अपने औषधीय गुणों के कारण भी खूब पहचानी जाती है. इसकी खेती भारत के लगभग सभी क्षेत्रों में की जाती है. लहसुन से बेहतर उत्पादन पाने के लिए सबसे ज़रूरी है. मिट्टी की सही तैयारी और कलियों की सटीक बुवाई पर विशेष ध्यान देना.

दरअसल, उद्यानिक क्षेत्र में 10 साल का अनुभव रखने वाले रायबरेली जिले के वरिष्ठ उद्यान निरीक्षक नरेंद्र प्रताप सिंह (बी.एससी. एग्रीकल्चर, इलाहाबाद विश्वविद्यालय) लोकल 18 से बातचीत में बताते हैं कि लहसुन की खेती करने वाले किसानों को सबसे पहले इससे जुड़ी कुछ जरूरी बातों की जानकारी होना बेहद आवश्यक है, ताकि उन्हें किसी भी तरह के नुकसान का सामना न करना पड़े.

उद्यान विशेषज्ञ नरेंद्र प्रताप सिंह बताते हैं कि लहसुन की फसल लगभग 120 से 150 दिनों में तैयार हो जाती है. उचित सिंचाई, नियमित देखभाल और रोग नियंत्रण के माध्यम से किसान हरी-भरी और अच्छी क्वालिटी वाली लहसुन की फसल प्राप्त कर सकते हैं.

लहसुन की खेती के लिए दोमट या बलुई दोमट मिट्टी सबसे उपयुक्त मानी जाती है, जिसमें जल निकासी की अच्छी व्यवस्था हो. भारी मिट्टी या जलभराव वाली भूमि लहसुन की फसल के लिए हानिकारक होती है. बुवाई से पहले खेत की 2–3 बार गहरी जुताई कर मिट्टी को भुरभुरी बना लेना चाहिए. इसके बाद प्रति बीघा 8–10 टन अच्छी तरह सड़ी हुई गोबर की खाद मिलाना जरूरी है, जिससे मिट्टी में जैविक पोषक तत्व बढ़ते हैं और फसल की बढ़वार बेहतर होती है.

लहसुन की बुवाई कलियों (cloves) से की जाती है. बीज के रूप में उपयोग होने वाली कलियां पूरी तरह विकसित, स्वस्थ और रोगमुक्त होनी चाहिए. एक कली का वजन लगभग 4–6 ग्राम होना आदर्श माना जाता है. छोटी, कच्ची या सड़ी हुई कलियों का उपयोग नहीं करना चाहिए, क्योंकि इससे अंकुरण कमजोर होता है. बुवाई से पहले कलियों को 1 लीटर पानी में 2 ग्राम थायरम या कार्बेन्डाजिम मिलाकर लगभग 30 मिनट तक उपचारित करना बेहद फायदेमंद होता है.

लहसुन की बुवाई अक्टूबर से नवंबर के बीच करना सबसे उपयुक्त माना जाता है. इसके लिए खेत को समतल करके 15 से 20 सेंटीमीटर की दूरी पर कतारें बनाएं. प्रत्येक कतार में 10 सेंटीमीटर के अंतराल पर कलियां लगाई जाएं. कलियों को मिट्टी में इस तरह दबाएं कि उनकी नोक ऊपर की ओर रहे और उन्हें लगभग 3–4 सेंटीमीटर मिट्टी से ढक दें.

बुवाई के तुरंत बाद हल्की सिंचाई करें, ताकि मिट्टी में नमी बनी रहे. इसके बाद हर 8–10 दिन के अंतराल पर पानी देते रहें, लेकिन खेत में जलभराव बिल्कुल नहीं होना चाहिए. पहली निराई-गुड़ाई 20–25 दिन बाद करें, ताकि खरपतवार न बढ़ें और पौधों को पर्याप्त हवा मिल सके.

फसल की अच्छी बढ़वार के लिए नाइट्रोजन, फास्फोरस और पोटाश की संतुलित मात्रा देना जरूरी होता है. वहीं, फफूंदजनित रोगों से बचाव के लिए ट्राइकोडर्मा या सल्फर का छिड़काव करना लाभदायक रहता है.