लाल सड़न…ये रोग गन्ने के लिए कैंसर, ट्राइकोडर्मा ही इसका इलाज, जानें तरीका
Last Updated:
Sugarcane crop care red rot disease : गन्ने की फसल के लिए लाल सड़न सबसे घातक रोग है. ये गन्ने के लिए कैंसर की तरह है. उत्तर प्रदेश गन्ना शोध संस्थान के विशेषज्ञ अब इससे निपटने के लिए ट्राइकोडर्मा के इस्तेमाल पर जोर दे रहे हैं. शाहजहांपुर के कृषि एक्सपर्ट डॉ. संजीव कुमार पाठक लोकल 18 से बताते हैं कि ट्राइकोडर्मा एक जैविक फफूंदनाशक है, जो मिट्टी में मौजूद हानिकारक फंगस को पनपने नहीं देता है. गन्ने में लगने वाले लाल सड़न जैसे रोग फंगस के कारण होते हैं, जो पूरी फसल को बर्बाद कर सकते हैं.
शाहजहांपुर. उत्तर प्रदेश के गन्ना किसानों के लिए ‘लाल सड़न’ (Red Rot) रोग हमेशा से एक बड़ी चुनौती रहा है. गन्ने का कैंसर कहे जाने वाले इस फंगल रोग से बचाव के लिए उत्तर प्रदेश गन्ना शोध संस्थान के विशेषज्ञ अब ‘ट्राइकोडर्मा’ के इस्तेमाल पर जोर दे रहे हैं. ट्राइकोडर्मा एक ऐसा मित्र फफूंद है जो हानिकारक फंगस को खत्म कर फसल की सुरक्षा करता है. विशेषज्ञों का मानना है कि अगर किसान सही समय पर और सही विधि से मृदा उपचार करें, तो गन्ने की पैदावार में होने वाले बड़े नुकसान को रोका जा सकता है. यह न केवल किफायती है बल्कि पर्यावरण के अनुकूल भी है.
कैसे करें उपयोग
शाहजहांपुर में गन्ना शोध संस्थान के प्रसार अधिकारी डॉ. संजीव कुमार पाठक बताते हैं कि ट्राइकोडर्मा एक जैविक फफूंदनाशक है जो मिट्टी में मौजूद हानिकारक फंगस को पनपने नहीं देता है. यह एक परजीवी की तरह काम करता है, जो अन्य फंगस को लपेटकर उन्हें नष्ट कर देता है. अगर किसान बुवाई के समय इसका प्रयोग नहीं कर पाए हैं, तो वे पहली सिंचाई के बाद इसे प्रयोग में ला सकते हैं. 10 किग्रा ट्राइकोडर्मा को 2-3 क्विंटल गोबर की सड़ी खाद में मिलाकर नम स्थान पर रखने से इसकी संख्या बढ़ जाती है, जिसे बाद में गन्ने की लाइनों में डालकर गुड़ाई कर देनी चाहिए.
दूसरे भी काम
गन्ने में लगने वाले लाल सड़न जैसे रोग फंगस के कारण होते हैं, जो पूरी फसल को बर्बाद कर सकते हैं. डॉ. संजीव पाठक बताते हैं कि ट्राइकोडर्मा मिट्टी के भीतर एक सुरक्षा कवच की तरह काम करता है. इसकी खासियत यह है कि यह किसी भी अन्य हानिकारक फंगस को अपने आसपास बढ़ने नहीं देता है. इसे ‘बायो-कंट्रोल एजेंट’ भी कहा जाता है, जो रासायनिक दवाओं की तुलना में अधिक प्रभावी और सुरक्षित विकल्प के रूप में उभर रहा है.
प्रयोग करने का समय
अगर किसान बुवाई के वक्त मृदा उपचार से चूक गए हैं, तो गन्ने के जमाव के 40-45 दिन बाद इसका प्रयोग किया जा सकता है. पहली सिंचाई के बाद जब खेत में नमी आ जाए, तब इसे डालना सबसे उपयुक्त होता है. ट्राइकोडर्मा को गोबर की खाद के साथ मिलाकर 2-3 दिन छायादार और नम स्थान पर रखना चाहिए ताकि मित्र फफूंद की संख्या कई गुना बढ़ जाए. इसके बाद इसे खेत की लाइनों में छिड़क कर गुड़ाई कर देनी चाहिए.
जैविक उपचार
ट्राइकोडर्मा के प्रयोग से न केवल गन्ने की बीमारियों पर नियंत्रण पाया जा सकता है, बल्कि यह मिट्टी की उर्वरक शक्ति को भी बनाए रखता है. यह विधि किसानों के लिए बहुत किफायती है और गन्ने की गुणवत्ता में सुधार लाती है. इस जैविक उपचार को अपनाकर किसान अपनी लागत कम कर सकते हैं और फसल को फंगल रोगों से पूरी तरह सुरक्षित रख सकते हैं.
About the Author
Priyanshu has more than 10 years of experience in journalism. Before News 18 (Network 18 Group), he had worked with Rajsthan Patrika and Amar Ujala. He has Studied Journalism from Indian Institute of Mass Commu…और पढ़ें