खेतों में छिपा है ‘साइलेंट किलर’, चारे का एक निवाला और तड़पकर दम तोड़ रहे पशु

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खेतों में छिपा है ‘साइलेंट किलर’, चारे का एक निवाला और तड़पकर दम तोड़ रहे पशु


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Shahjahanpur News: गर्मियों में पानी की कमी और भीषण गर्मी के कारण ज्वार-बाजरे के पौधों में ‘साइनोसाइड’ नामक खतरनाक विषैला तत्व बनने लगता है. यह सूखा और सिकुड़ा चारा खाने से पशु गंभीर रूप से बीमार हो सकते हैं और उनकी जान भी जा सकती है. कृषि एक्सपर्ट ने पशुपालकों को नियमित सिंचाई करने और ऐसा चारा न खिलाने की सख्त हिदायत दी है.

शाहजहांपुर: गर्मियों के मौसम में पशुपालक अपने दुधारू पशुओं को हरा चारा खिलाने के लिए बड़े पैमाने पर ज्वार और बाजरा की बुवाई करते हैं. लेकिन भीषण गर्मी और पानी की कमी के कारण कई बार इन फसलों की पत्तियां सिकुड़ने लगती हैं और पौधे सूखने लगते हैं. अधिकांश किसान इसे एक सामान्य मौसमी बदलाव समझकर नजरअंदाज कर देते हैं, जो कि बेहद खतरनाक साबित हो सकता है.

एक्सपर्ट का कहना है कि ऐसी स्थिति में चारे के पौधों के भीतर एक हानिकारक केमिकल का निर्माण होता है, जिसे खाकर पशु न सिर्फ गंभीर रूप से बीमार हो सकते हैं, बल्कि उनकी जान भी जा सकती है. इसलिए इस मौसम में पशुओं को चारा खिलाते समय विशेष सावधानी बरतने की सख्त जरूरत है.

समय पर इलाज ना मिलने के कारण मौत
वरिष्ठ कृषि विशेषज्ञ डॉ. एन.पी. गुप्ता ने बताया कि जब गर्मियों में तापमान अत्यधिक बढ़ जाता है और लंबे समय तक बारिश नहीं होती, तो ज्वार और बाजरे के पौधों में पानी की कमी हो जाती है. ऐसी तनावपूर्ण स्थिति में इन पौधों के भीतर ‘साइनोसाइड’ (Cyanoside) नामक एक विषैला रासायनिक तत्व बनने लगता है. अगर पशुपालक इस सूखे या सिकुड़े हुए चारे को अपने मवेशियों को खिलाते हैं, तो यह सीधे उनके स्वास्थ्य पर असर डालता है. इस जहरीले तत्व के प्रभाव से पशु गंभीर रूप से बीमार हो सकते हैं और समय पर उपचार न मिलने पर उनकी मृत्यु भी हो सकती है. इसलिए किसान सिकुड़ी पत्तियों वाले चारे को पशुओं को बिल्कुल न खिलाएं.

फसलों में क्यों बनता है यह खतरनाक तत्व
गर्मियों के महीनों में चलने वाली तेज लू और झुलसाने वाली धूप के कारण खेतों की नमी तेजी से खत्म होने लगती है. जब ज्वार और बाजरे जैसी फसलों को समय पर पर्याप्त पानी नहीं मिलता, तो वे खुद को बचाने के लिए पत्तियों को सिकोड़ लेती हैं. इस प्राकृतिक बदलाव के दौरान पौधों की कोशिकाओं में रासायनिक असंतुलन पैदा होता है, जिसके परिणामस्वरूप साइनोसाइड का स्तर खतरनाक रूप से बढ़ जाता है. किसानों को लगता है कि यह केवल धूप का असर है, लेकिन वास्तव में यह चारा पशुओं के लिए धीमा जहर बन जाता है.

पशुओं के स्वास्थ्य पर इसका घातक प्रभाव
जब कोई दुधारू या अन्य पशु इस विषैले तत्व से युक्त चारे का सेवन करता है, तो साइनोसाइड उसके पेट में जाकर साइनाइड जैसी गैस में बदल सकता है, जो सीधे तंत्रिका तंत्र और श्वसन प्रणाली पर हमला करती है. इससे पशु को सांस लेने में भारी तकलीफ होने लगती है, मुंह से झाग आने लगता है और वह छटपटाने लगता है. कई बार पशुपालक समझ ही नहीं पाते कि अचानक उनके स्वस्थ पशु की हालत इतनी क्यों बिगड़ गई, और देखते ही देखते पशु दम तोड़ देता है.

नियमित और हल्की सिंचाई कारगर 
इस गंभीर समस्या से निपटने का सबसे आसान और प्रभावी तरीका समय पर खेतों की सिंचाई करना है. एक्सपर्ट का कहना है कि गर्मियों में फसलों को बहुत लंबे समय तक सूखा न छोड़ें. ज्वार और बाजरे की फसल में हर 7 से 10 दिनों के अंतराल पर हल्की सिंचाई अवश्य करते रहें. नियमित रूप से पानी मिलने से पौधों में नमी बनी रहेगी, जिससे साइनोसाइड केमिकल नहीं बन पाएगा और चारा पशुओं के लिए पूरी तरह सुरक्षित रहेगा.

किसानों के लिए महत्वपूर्ण सतर्कता और सलाह
पशुपालकों को खेतों से चारा काटते समय पौधों का बारीकी से निरीक्षण करना चाहिए. अगर किसी हिस्से में पत्तियां मुड़ी हुई, पीली या सूखी दिखाई दें, तो उस चारे को पशुओं के आगे डालने से बचें. पहले खेत में अच्छी तरह पानी लगाएं और जब पौधे दोबारा सामान्य और हरे-भरे दिखने लगें, तभी उनकी कटाई करें. थोड़ी सी जागरूकता और वैज्ञानिक तौर-तरीकों को अपनाकर किसान अपने पशुओं को इस गम्भीर खतरे से बचा सकते हैं और दूध उत्पादन को भी प्रभावित होने से रोक सकते हैं.

About the Author

आर्यन सेठ

आर्यन ने नई दिल्ली के जामिया मिलिया इस्लामिया से पत्रकारिता की पढ़ाई की और एबीपी में काम किया. उसके बाद नेटवर्क 18 के Local 18 से जुड़ गए.



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