गाजीपुर की कजरी में सावन-भादो की रिमझिम, मिर्जापुर-बनारस तक फैली मिठास

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गाजीपुर की कजरी में सावन-भादो की रिमझिम, मिर्जापुर-बनारस तक फैली मिठास


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कजरी नाम एक लड़की के नाम से आया है, जो कान्तित (मिर्जापुर क्षेत्र) के राजा की बेटी थी. वह अपनी प्रेमी से बहुत प्रेम करती थी.लेकिन उनसे अलग हो गई थी. उनकी यादों और विरह की मर्मस्पर्शी भावनाओं को व्यक्त करने वाले…और पढ़ें

भादो का महीना आते ही पूर्वांचल की मिट्टी महक उठती है, खेत-खलिहानों में हरियाली बिछ जाती है और आसमान से बरसती बूंदों के बीच लोकगीतों की मधुर आवाजें गूंजने लगती हैं. इन दिनों गाजीपुर में एक खास चीज की चर्चा हर चौपाल, हर आंगन में होती है.लोकगीतों के जानकार और गाजीपुर के सांस्कृतिक पुरोधा विद्यानिवास पांडे बताते हैं. कजरी सिर्फ गीत नहीं है. यह हमारे मौसम, हमारे रिश्तों और हमारी भावनाओं का संगीत है. भादो में गाजीपुर की कजरी में प्रेम, विरह, बरसात और गंगा की महिमा—सबका रंग घुला होता है.

कजरी गीत का नाम के पीछे कई मान्यताएं. इतिहास जुड़ा हुआ है. कजरी नाम एक लड़की के नाम से आया है, जो कान्तित (मिर्जापुर क्षेत्र) के राजा की बेटी थी. वह अपनी प्रेमी से बहुत प्रेम करती थी.लेकिन उनसे अलग हो गई थी. उनकी यादों और विरह की मर्मस्पर्शी भावनाओं को व्यक्त करने वाले गीतों को स्थानीय लोग कजरी के नाम से याद करते हैं. इसी कारण से यह लोकगीत कजरी कहलाया.

बोलचाल का अनूठा संगम
कजरी की जड़ें मिर्जापुर के बुढेनाथ मंदिर और राजा दानवरैया की कथा से जुड़ी मानी जाती हैं. बनारस और गाजीपुर ने इसे अपने सुर और स्वाद से अलग पहचान दी है. गाजीपुर की कजरी में भोजपुरी की मिठास, बनारसी ठाठ और स्थानीय बोलचाल का अनूठा संगम है. सावन-भादो में गांव की स्त्रियां पीपल या बरगद के नीचे झूला डालकर गाती हैं.

बदरिया आई गइले ननदी
इन गीतों में सावन की मस्ती, खेतों की हरियाली और प्रेम की गहराई का ऐसा वर्णन होता है. सुनने वाला बरसाती माहौल में खो जाए. पांडे जी कहते हैं. गाजीपुर की कजरी में गंगा के किनारे का जीवन, नाव की लय, और गांव की सादगी भी झलकती है.वाद्ययंत्र में ढोलक, मंजीरा, हारमोनियम और कभी-कभी बांसुरी का इस्तेमाल होता है। पहले इन गीतों का गायन फसल की बुआई-कटाई और तीज-त्योहार पर होता था, लेकिन अब यह एक सांस्कृतिक उत्सव की तरह मनाया जाता है. भले ही शहरों में कजरी का स्वर धीमा हो गया हो, लेकिन गाजीपुर के गांवों में यह आज भी उतनी ही जोश और आत्मीयता के साथ गाई जाती है। यहां कजरी सिर्फ गीत नहीं, बल्कि पीढ़ियों से चलती आ रही एक धरोहर है,जो बारिश के मौसम में भावनाओं की सबसे मीठी बौछार बनकर बरसती है.

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