जस्टिस शेखर यादव कौन हैं, मुस्लिमों को ऐसा क्या कहा था? जानें पूरी कहानी

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जस्टिस शेखर यादव कौन हैं, मुस्लिमों को ऐसा क्या कहा था? जानें पूरी कहानी


इलाहाबाद हाईकोर्ट के जज जस्टिस शेखर कुमार यादव आज रिटायर हो रहे हैं. उनके रिटायरमेंट के साथ ही संसद में उनके खिलाफ चल रही महाभियोग की कोशिश भी अधूरी रह गई. अपने कार्यकाल के दौरान दिए गए कुछ फैसलों और खासतौर पर दिसंबर 2024 में दिए गए एक भाषण ने उन्हें देशभर में चर्चा में ला दिया था, जिसे लेकर कई लोगों ने उनकी खूब आलोचना की थी.

जस्टिस यादव का पूरा करियर ही विवादों से भरा रहा. सरकारी वकील से हाईकोर्ट जज बनने तक, गाय संरक्षण से लेकर यूनिफॉर्म सिविल कोड तक – उनके कई फैसलों और बयानों ने हमेशा सुर्खियां बटोरीं. तो चलिये जानते हैं कि जस्टिस शेखर यादव कौन हैं, उनका न्यायिक सफर कैसा रहा, और उनके खिलाफ महाभियोग की मांग आखिर क्यों उठी थी?

कौन हैं जस्टिस शेखर कुमार यादव?

जस्टिस शेखर कुमार यादव का करियर न्यायपालिका में आने से पहले सरकारी वकील (असिस्टेंट गवर्नमेंट एडवोकेट) के तौर पर शुरू हुआ. वे उत्तर प्रदेश सरकार की ओर से अदालत में पक्ष रखते थे. बाद में उन्हें इलाहाबाद हाईकोर्ट में जज नियुक्त किया गया, लेकिन उनकी नियुक्ति का रास्ता आसान नहीं था.

अक्टूबर 2018 में सुप्रीम कोर्ट के तत्कालीन चीफ जस्टिस दीपक मिश्रा की अध्यक्षता वाले कॉलेजियम ने उनके नाम पर विचार टाल दिया था. उस समय कॉलेजियम में जस्टिस रंजन गोगोई और जस्टिस मदन बी. लोकुर भी शामिल थे. हालांकि, फरवरी 2019 में तत्कालीन सीजेआई रंजन गोगोई की अगुवाई वाले कॉलेजियम ने जस्टिस एके सीकरी और जस्टिस एसए बोबडे के साथ मिलकर उनके नाम की सिफारिश पर मुहर लगा दी.

इसके बाद दिसंबर 2019 में उन्हें अतिरिक्त न्यायाधीश (एडिशनल जज) के रूप में नियुक्त किया गया और मार्च 2021 में वे स्थायी न्यायाधीश (परमानेंट जज) बन गए.

किन फैसलों से चर्चा में आए जस्टिस यादव?

जस्टिस यादव अपने कई आदेशों और टिप्पणियों के कारण चर्चा में रहे. खासतौर पर गौ-हत्या से जुड़े मामलों में उन्होंने कुछ ऐसे सुझाव दिए, जिन्होंने देशभर में बड़ी बहस छिड़ गई थी और विपक्षी दलों ने उनकी खूब आलोचना की थी.

उन्होंने केंद्र सरकार से गाय को ‘राष्ट्रीय पशु’ घोषित करने की सिफारिश की थी. साथ ही यह भी कहा था कि गाय की सुरक्षा को हिंदुओं के लिए मौलिक अधिकार बनाया जाना चाहिए. अपने आदेशों में उन्होंने गाय और उसके दूध के लाभों का भी जिक्र किया.

अक्टूबर 2021 में एक अन्य मामले में, जिसमें एक व्यक्ति पर हिंदू देवी-देवताओं के खिलाफ सोशल मीडिया पोस्ट करने का आरोप था, जमानत देते हुए जस्टिस यादव ने संसद से कानून बनाने की सलाह दी थी. उन्होंने कहा था कि भगवान राम और कृष्ण, रामायण, गीता और उनके रचनाकारों वाल्मीकि और वेदव्यास को सम्मान देने के लिए कानून बनाया जाना चाहिए.

किस बात पर हुआ विवाद?

जस्टिस शेखर यादव को लेकर सबसे बड़ा विवाद 8 दिसंबर 2024 को सामने आया, जब उन्होंने इलाहाबाद हाईकोर्ट परिसर में आयोजित एक कार्यक्रम में भाषण दिया. यह कार्यक्रम भारत विकास परिषद द्वारा आयोजित था, जिसे आरएसएस से जुड़ा संगठन माना जाता है.

इस भाषण में उन्होंने यूनिफॉर्म सिविल कोड (UCC) पर बोलते हुए कहा, ‘भारत बहुसंख्यक की इच्छाओं के अनुसार चलेगा.’ जस्टिस शेखर ने कहा था, ‘मुझे यह कहने में कोई गुरेज नहीं है कि हिंदुस्तान बहुसंख्यकों की इच्छा के हिसाब से चलेगा. मैं यह बात हाईकोर्ट जज के तौर पर नहीं बोल रहा, परिवार या समाज में जो बात ज्यादा लोगों को मंजूर होती है, वही स्वीकार की जाती है.

उन्होंने यह भी कहा था कि, ‘कठमुल्ला शब्द गलत है, लेकिन यह कहने में परहेज नहीं है क्योंकि वो देश के लिए बुरा है. वो जनता को भड़काने वाले लोग हैं. देश आगे न बढ़े, इस प्रकार की सोचने के लोग हैं. उनसे सावधान रहने की जरूरत है.’

जस्टिस यादव के इस बयान को लेकर बड़ा विवाद खड़ा हो गया. आरोप यह भी लगा कि उन्होंने मुस्लिम समुदाय के खिलाफ आपत्तिजनक शब्दों का इस्तेमाल किया और ट्रिपल तलाक जैसी प्रथाओं की आलोचना की. उनके इस बयान को लेकर न्यायपालिका की निष्पक्षता और धर्मनिरपेक्षता पर सवाल उठने लगे. कई कानूनी विशेषज्ञों और विपक्षी नेताओं ने इसे ‘हेट स्पीच’ करार दिया.

जस्टिस यादव ने कॉलेजियम से क्या कहा?

विवाद बढ़ने के बाद सुप्रीम कोर्ट के 13 वरिष्ठ वकीलों ने तत्कालीन मुख्य न्यायाधीश संजीव खन्ना को पत्र लिखकर जस्टिस यादव के खिलाफ सीबीआई जांच की मांग की. इसके बाद सुप्रीम कोर्ट कॉलेजियम ने उन्हें तलब किया.

रिपोर्ट्स के मुताबिक, कॉलेजियम ने उनसे सार्वजनिक रूप से माफी मांगने को कहा, लेकिन जस्टिस यादव ने ऐसा करने से इनकार कर दिया. उन्होंने इलाहाबाद हाईकोर्ट के मुख्य न्यायाधीश को पत्र लिखकर साफ कहा कि वे अपने बयान पर कायम हैं.

यह घटनाक्रम न्यायपालिका के भीतर अनुशासन और जवाबदेही को लेकर भी एक बड़ा सवाल बन गया.

फिर महाभियोग चलाने की उठी मांग

इसके बाद 13 दिसंबर 2024 को राज्यसभा में विपक्ष के 54 सांसदों ने जस्टिस यादव के खिलाफ महाभियोग प्रस्ताव का नोटिस दिया. उन पर आरोप लगाया गया कि उनके बयान से सांप्रदायिक तनाव बढ़ सकता है और यह न्यायिक आचरण के खिलाफ है.

हालांकि, इस मुद्दे पर राजनीतिक मतभेद भी साफ नजर आए. उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने जस्टिस यादव का समर्थन किया.

क्यों आगे नहीं बढ़ सका महाभियोग?

महाभियोग की प्रक्रिया आगे बढ़ने से पहले ही तकनीकी कारणों में उलझ गई. राज्यसभा सचिवालय ने बताया कि प्रस्ताव में दिए गए 54 सांसदों के हस्ताक्षरों में ‘मिसमैच’ है. इसके बाद सत्यापन प्रक्रिया शुरू की गई.

2025 के मध्य तक केवल 44 सांसद ही अपने हस्ताक्षर प्रमाणित कर पाए, जबकि प्रस्ताव को आगे बढ़ाने के लिए कम से कम 50 सांसदों का समर्थन जरूरी था. इस वजह से महाभियोग की प्रक्रिया ठप पड़ गई.

रिटायरमेंट से पहले खत्म हुआ मामला

जस्टिस शेखर यादव अब अपने निर्धारित समय पर रिटायर हो रहे हैं. चूंकि महाभियोग की प्रक्रिया आगे नहीं बढ़ सकी, इसलिए उनके खिलाफ कोई औपचारिक कार्रवाई नहीं हो पाई.

यह मामला इस बात का उदाहरण बन गया है कि न्यायाधीशों के खिलाफ महाभियोग की प्रक्रिया कितनी जटिल और कठिन होती है. साथ ही यह भी दिखाता है कि न्यायपालिका के भीतर आचरण से जुड़े विवाद किस तरह संवैधानिक और राजनीतिक बहस का विषय बन जाते हैं.

जस्टिस शेखर कुमार किन फैसलों के कारण चर्चा में रहे?
गौ-हत्या से जुड़े मामलों में उन्होंने गाय को राष्ट्रीय पशु घोषित करने और गौ-रक्षा को मौलिक अधिकार बनाने की सिफारिश की थी. साथ ही राम, कृष्ण और धार्मिक ग्रंथों को सम्मान देने के लिए कानून बनाने की बात भी कही थी.

सबसे बड़ा विवाद किस वजह से हुआ?
दिसंबर 2024 में आरएसएस से जुड़े एक कार्यक्रम में दिए गए उनके भाषण को लेकर विवाद हुआ, जिसमें उन्होंने कहा कि ‘भारत बहुसंख्यक की इच्छा के अनुसार चलेगा’ और मुस्लिम समुदाय को लेकर कठमुल्ला जैसे शब्द का इस्तेमाल किया.

उनके खिलाफ महाभियोग की मांग क्यों उठी?
विपक्ष के 54 सांसदों ने राज्यसभा में नोटिस देकर उन पर सांप्रदायिक तनाव फैलाने और अनुचित बयान देने का आरोप लगाया.

आखिर महाभियोग क्यों नहीं हो पाया?
50 सांसदों का समर्थन जरूरी था, लेकिन सत्यापन के बाद सिर्फ 44 हस्ताक्षर ही वैध पाए गए, जिससे प्रक्रिया आगे नहीं बढ़ सकी.

जस्टिस शेखर कुमार यादव का कार्यकाल एक ऐसे दौर के रूप में याद किया जाएगा, जहां उनके फैसलों और बयानों ने न्यायपालिका की भूमिका, सीमाएं और निष्पक्षता को लेकर व्यापक बहस छेड़ दी. एक ओर उनके समर्थक उन्हें स्पष्टवादी और सांस्कृतिक मूल्यों के पक्षधर के रूप में देखते हैं, वहीं आलोचक उन्हें न्यायिक मर्यादा से बाहर जाकर टिप्पणी करने वाला जज मानते हैं.

उनकी रिटायरमेंट के साथ भले ही महाभियोग की प्रक्रिया खत्म हो गई हो, लेकिन उनके इर्द-गिर्द उठा विवाद आने वाले समय में न्यायपालिका के आचरण और जवाबदेही पर चर्चा को प्रभावित करता रहेगा.



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