पांचवीं पास गोंडा का ये किसान 2 बीघे से छाप रहा नोट, जानिए लाखों की कमाई का तरीका
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Lauki ki kheti : यूपी के गोंडा का ये किसान सिर्फ पांचवीं तक पढ़ा है. आज वह लौकी की खेती करने वालों में अपनी अलग पहचान रखता है. आसपास के किसानों के लिए प्रेरणा बन चुका है. लोकल 18 से प्रगतिशील किसान राम निहाल मौर्य बताते हैं कि हमारे पूर्वज खेती ही करते थे, लेकिन वे पारंपरिक खेती करते थे. हमने लीक से हटकर रास्ता अपनाया. शुरुआत में थोड़ी परेशानी जरूर हुई, लेकिन धीरे-धीरे मेहनत रंग लाने लगी. अब सालाना लाखों का इनकम है. फसल बेचने में कोई परेशानी नहीं होती.
गोंडा. सफलता के लिए बड़ी डिग्री नहीं, बल्कि मेहनत और लगन की जरूरत होती है. उत्तर प्रदेश स्थित गोंडा के इस किसान ने इसे सच कर दिखाया है. विकासखंड रूपईडीह का ये किसान सिर्फ पांचवीं तक पढ़ा है. आज वह लौकी की खेती करने वालों में अपनी अलग पहचान रखता है. इसी खेती से हर साल लाखों रुपये की कमाई कर रहा है. आसपास के किसानों के लिए प्रेरणा बन चुका है. लोकल 18 से प्रगतिशील किसान राम निहाल मौर्य बताते हैं कि घर की आर्थिक स्थिति ठीक न होने से पांचवी के बाद पढ़ाई नहीं कर सके. इस समय दो बीघा में लौकी की खेती कर रहे हैं. राम निहाल मौर्य बताते हैं कि हमारे पूर्वज खेती ही करते थे, लेकिन वे पारंपरिक खेती करते थे. हमने लीक से हटकर लौकी की खेती की शुरू की, जिससे अब सालाना लाखों का इनकम हो रहा है.
कितनी लागत
राम निहाल मौर्य के मुताबिक, पहले वह पारंपरिक खेती करते थे, लेकिन उसमें ज्यादा फायदा नहीं हो पाता था. खेती में लागत ज्यादा लगती थी और मुनाफा कम मिलता था. इसके बाद उन्होंने सब्जियों की खेती करने का फैसला किया. कई लोगों से जानकारी लेने और खेती के नए तरीके सीखने के बाद उन्होंने लौकी की खेती शुरू की. शुरुआत में थोड़ी परेशानी जरूर हुई, लेकिन धीरे-धीरे मेहनत रंग लाने लगी. राम निहाल मौर्य बताते हैं कि वह इस समय लगभग दो बीघा में लौकी की खेती कर रहे हैं. दो बीघा लौकी की खेती में लगभग तीन से 4 हजार रुपए की लागत लगी है.
खेतों से ही बिक जाती फसल
राम निहाल मौर्य करीब 6 साल से लौकी की खेती कर रहे हैं. उन्होंने बीएनआर सरिता वैरायटी की लौकी लगाई है जो गोंडा के वातावरण में काफी अच्छे से उगती है. समय-समय पर सिंचाई और देखभाल करते हैं. खेत में जैविक खाद का भी इस्तेमाल किया, जिससे फसल अच्छी हुई. लौकी की खेती में ज्यादा समय नहीं लगता और बाजार में इसकी मांग हमेशा बनी रहती है. यही वजह है कि उन्हें फसल बेचने में कोई परेशानी नहीं होती. आसपास के व्यापारी भी सीधे खेत पर आकर लौकी खरीद ले जाते हैं.
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प्रियांशु गुप्ता बीते 10 साल से भी ज्यादा समय से पत्रकारिता में सक्रिय हैं. 2015 में भारतीय जनसंचार संस्थान (IIMC), दिल्ली से जर्नलिज्म का ककहरा सीख अमर उजाला (प्रिंट, नोएडा ऑफिस) से अपने करियर की शुरुआत की. य…और पढ़ें