यूपी चुनाव में नीतीश के ट्राइड एंड टेस्टेड फॉर्मूले को आजमा रहे जयंत चौधरी

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यूपी चुनाव में नीतीश के ट्राइड एंड टेस्टेड फॉर्मूले को आजमा रहे जयंत चौधरी


लखनऊ: उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव में तमाम राजनीतिक दल अपने पारंपरिक स्टैंड से अलग वोटबैंक पर ध्यान देने के प्रयास में हैं. ओबीसी और मुसलमान की राजनीति करने वाली मुख्य विपक्षी समाजवादी पार्टी इस चुनाव में ब्राह्मण वोटरों का भरोसा जीतने की कोशिश कर रही है. वहीं सवर्णों की राजनीति से उभरी बीजेपी भी दलित और ओबीसी वोटरों पर विशेष फोकस कर रही है. अब एनडीए की घटक दल राष्ट्रीय लोकदल (आरएलडी) भी जाट वोटरों से इतर अन्य एमबीसी वोटरों में अपनी पैठ बनाने के प्रयास में दिख रही है.

केंद्रीय मंत्री जयंत चौधरी की पार्टी आरएलडी लंबे समय से जाट को केंद्र में रखकर राजनीति करती रही है. 2027 के विधानसभा चुनाव से पहले जयंत चौधरी 29 सबसे पिछड़ी जातियों (MBC) को प्रतिनिधित्व देकर संगठन में बड़े बदलाव की योजना बना रहे हैं. आरएलडी अध्यक्ष जयंत चौधरी को लिखे एक पत्र में, पार्लियामेंट्री बोर्ड के चेयरमैन केसी त्यागी ने पश्चिमी उत्तर प्रदेश के हस्तिनापुर, रुहेलखंड और ब्रज क्षेत्रों में फैली 29 जातियों की एक लिस्ट सौंपी है, ये इलाके कुल मिलाकर लगभग 100 विधानसभा सीटों पर प्रभाव रखते हैं.

एमबीसी की इन 29 जातियों पर आरएलडी की नजर

आरएलडी जिन 29 जातियों को अपने साथ जोड़ने के प्रयास में है उसमें- भुर्जी, कंदू, माली-सैनी, धोबी, हलवाई, जोगी, कहार, धीमर, कोइरी, ठठेरा, नाई, कुंजड़ा, नट, बियार और कहार, धीवर, मल्लाह, कश्यप, गोसाईं, कंबोज, गड़ेरिया, दर्जी, अंसारी, बधाई, कुम्हार, मोची, मोमिन अंसार, मुस्लिम बंजारा, सुनार, भाट, तेली, धीमान-लोहार का एक और जाति समूह.

केसी त्यागी ने कहा कि उन्होंने लीडरशिप को सलाह दी कि वे इन समुदायों के नेताओं को जिला, क्षेत्रीय और राज्य-स्तरीय पार्टी इकाइयों में शामिल करें ताकि आरएलडी का वोट बेस बढ़ सके और बीजेपी के नेतृत्व वाले राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (NDA) को मजबूत किया जा सके, जिसमें आरएलडी केंद्र और राज्य दोनों स्तरों पर भागीदार है.

नेतृत्व की तलाश में हैं MBC जातियां

उन्होंने कहा, ‘आरएलडी की ताकत बढ़ने से एनडीए और मज़बूत होगा. इन MBCs ने शुरू में कांग्रेस का साथ दिया, बाद में जनता दल में चले गए, राम जन्मभूमि आंदोलन के दौरान बीजेपी का साथ दिया और फिर बहुजन समाज पार्टी (BSP) की तरफ चले गए. आज, ये जातियां एक चौराहे पर हैं, और हम उन्हें अपने साथ ला सकते हैं.’

इस कदम का मकसद विपक्षी समाजवादी पार्टी (सपा) के पीडीए फ़ॉर्मूले पिछड़ा (पिछड़ा), दलित, और अल्पसंख्यक (अल्पसंख्यक) का मुकाबला करना है, साथ ही एमबीसी सपोर्ट के लिए निषाद पार्टी और सुहेलदेव भारतीय समाज सभा (SBSP) जैसे मौजूदा एनडीए सहयोगियों के साथ मुकाबला करना है.

नीतीश कुमार के कर्पूरी ठाकुर मॉडल से प्रेरणा

यह प्रस्तावित कोशिश बिहार में जनता दल (यूनाइटेड) के नेता नीतीश कुमार की ओर से कर्पूरी ठाकुर फॉर्मूले पर आधारित सोशल इंजीनियरिंग मॉडल से प्रेरणा लेती है.

इस साल की शुरुआत में आरएलडी में शामिल हुए जेडीयू के पुराने नेता केसी त्यागी ने कहा कि हालांकि बिहार की आबादी में कुर्मी तीन फीसदी से भी कम हैं, लेकिन नीतीश कुमार ने बहुत पिछड़ी जातियों (EBCs) और MBCs को एक साथ लाकर दो दशकों से ज्यादा समय तक राज किया. उत्तर प्रदेश में भी ऐसा ही मॉडल लागू करने का मकसद पार्टी के कोर जाट वोटरों से आगे एक बड़ा गठबंधन बनाना है.

एमबीसी का प्रस्ताव आरएलडी की एक जाति के लेबल को हटाने की बड़ी स्ट्रैटेजी का हिस्सा है. पार्टी ने पहले यूपी कैबिनेट में एक दलित मंत्री बनाया था और 2024 के लोकसभा चुनावों में जाट और गुर्जर उम्मीदवारों को मैदान में उतारा था. आरएलडी ने हाल ही में ब्राह्मण अनुपम मिश्रा को वर्किंग स्टेट प्रेसिडेंट बनाने के तुरंत बाद राजपूत ऐश्वर्य राज सिंह को अपना यूपी प्रदेश अध्यक्ष बनाया है. आरएलडी की मौजूदा ताकत पर नजर डालें तो उत्तर प्रदेश से 9 विधायक, एक एमएलसी, दो लोगसभा सांसद और एक राज्यसभा सांसद हैं.



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