राम मंदिर में भी वैसा ही होना चाहिए, जैसा 44 साल पहले काशी विश्वनाथ में हुआ..
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Kashi Vishwanath Temple 1983 Theft : काशी विश्वनाथ मंदिर में जिस वक्त यह घटना हुई, तब यूपी में श्रीपति मिश्र की सरकार थी. उन्होंने मामले की जांच श्रीश चंद्र दीक्षित की अगुवाई में सौंपी. राज्य पुलिस ने तेजी से इस पर काम शुरू किया और तेज़ी 22 जनवरी 1983 तक 11 लोगों को अरेस्ट कर लिया गया था. लगभग 44 साल पहले हुई चोरी की इस घटना ने एक टर्निंग प्वॉइंट साबित हुई. इसके बाद सरकार ने एक ऐसा फैसला लिया, जिसने मंदिर के मैनेजमेंट में बदलाव और बड़ा रिफॉर्म किया. यह क्या था, आपको भी जानना चाहिए. खासकर राम मंदिर में हुई दान चोरी के बड़े मामले में ऐसा ही कड़ा कदम उठाए जाने की जरूरत है.
राम मंदिर दान चोरी विवाद के बीच 44 साल पुराना काशी विश्वनाथ केस चर्चा में, तब सरकार ने संभाल लिया था मंदिर का कंट्रोल..
वाराणसी : अयोध्या के राम मंदिर में हुए दान चोरी मामले ने मंदिर संचालन के प्रबंधन और चढ़ावे की पारदर्शिता को लेकर गहरा असंतोष पैदा किया है. चंपत राय, गोपाल राव और अनिल मिश्रा पर लगे गंभीर आरोपों ने ना केवल राज्य सरकार बल्कि केंद्र को भी सोचने पर मजबूर कर दिया है. जनता सवाल उठा रही है कि छोटे प्यादों को पकड़ लेने से क्या हासिल होगा? बड़ी मछलियां कब पकड़ी जाएंगी? कहा यह भी जा रहा है कि सरकार को मंदिर का नियंत्रण अपने हाथ में लेना चाहिए. जांच के लिए गठित एसआईटी ने अपनी शुरुआती रिपोर्ट में भी इसकी संस्तुति की है और कहा है कि एक CEO की नियुक्ति की जाए.. लेकिन क्या आप जानते हैं कि 44 साल पहले भी ऐसा उत्तर प्रदेश में हो चुका है. यहां काशी विश्वनाथ मंदिर में हुई बड़ी चोरी के बाद राज्य सरकार ने तोबड़तोड़ एक्शन लिया था. 11 लोग अरेस्ट हुए थे. और तो और राज्य सरकार ने मंदिर का कंट्रोल अपने हाथ में ले लिया था. मामले में काफी विवाद भी हुआ, लेकिन ये बड़े मंदिरों में रिफॉर्म का उदाहरण बनकर साबित हुआ. आइये जानते हैं इस बारे में..
मंदिर में क्या हुई थी बड़ी चोरी?
बात 44 साल पहले जनवरी 1983 की है. जब वाराणसी के काशी विश्वनाथ मंदिर में 4 और 5 जनवरी 1983 की रात सोने का अर्घा यानि शिवलिंग के चारों ओर का आधार, जिसका वजन करीब 2.6 किलोग्राम सोना था.. चोरी हो गया था.. जैसे ही यह बात बनारस के लोगों तक पहुंची, वहां भारी आक्रोश पैदा हो गया. लोगों के बीच भारी नाराजगी देख केंद्र और राज्य सरकार की नींद उड़ गई. उस वक्त उत्तर प्रदेश में मुख्यमंत्री श्रीपति मिश्र थे. उन्होंने की सरकार थी. मामले की जांच तुरंत उस वक्त के यूपी पुलिस के महानिदेशक यानि DGP श्रीश चंद्र दीक्षित की अगुवाई में सौंपी गई. राज्य पुलिस ने बेहद तेजी से जांच की. 22 जनवरी 1983 तक 11 लोगों को अरेस्ट कर लिया गया. चोरी हुआ ज्यादातर सामान भी बरामद कर लिया गया था. जांच प्रकिया बहुत लंबी चली. बाद में चोरी हुआ सामान नवंबर 2006 में मंदिर ट्रस्ट को वापस कर दिया गया.
लेकिन इस कार्रवाई के नतीजे दूरदर्शी साबित हुए. सदियों से चली आ रही महंत के नेतृत्व वाली मंदिर को संभालने की व्यवस्था के खिलाफ लोग हो गए. इसकी खूब आलोचना हुई. राज्य सरकार पर काफी दवाब बढ़ा, जिसके चलते उसने एक कड़ा कदम उठाया. सरकार की तरफ से 28 जनवरी 1983 को एक अध्यादेश जारी किया गया. यह मंदिर के भविष्य के मद्देनजर काफी अहम था. इसके तहत मंदिर का मैनेजमेंट सरकार की तरफ से गठित की गई ट्रस्ट को सौंप दिया गया.
और सरकार ने बना दिया उत्तर प्रदेश श्री काशी विश्वनाथ मंदिर एक्ट
7 सितंबर 1983 को तत्कालीन समाज कल्याण मंत्री गुलाब सेहरा ने अध्यादेश की जगह लेने के लिए यूपी विधानसभा में एक बिल को पेश किया, जोकि पास हुआ और 12 अक्टूबर 1983 को राष्ट्रपति ने इसे मंजूरी दी.. और उत्तर प्रदेश श्री काशी विश्वनाथ मंदिर एक्ट, 1983 अस्तित्व में आया और लागू किया गया. इस एक्ट के तहत ट्रस्टियों का एक बोर्ड बना. इस बोर्ड में जाने-माने धार्मिक लोग और एक वरिष्ठ सरकारी अधिकारी को शामिल किया गया. साथ ही रोजाना के कामकाज के लिए एक एग्ज़ीक्यूटिव कमेटी भी बनाई गई. ट्रस्ट का प्रेसिडेंट विभूति नारायण सिंह को बनाया गया और वे 2000 तक इस पद पर बने रहे. अपने निधन तक.
यह बदलाव काफी निर्णायक साबित हुआ. इसकी वजह से मंदिर के संचालन के तौर तरीकों में फर्क साफ दिखाई दिया. मसलन महंतों के वक्त में जहां रोज चढ़ावे की रकम करीब 300 से 500 रुपये तक बताई जाती थी, वह बढ़कर 1500 रुपये तक पहुंच गई. यानि रोजाना आने वाले दान की राशि में घपला कर उसे जो कम बताया था, वह एकाएक बढ़ा. वहीं, जब सरकार ने मंदिर का कंट्रोल अपने हाथ में लिया, तब मंदिर की संपत्ति लगभग 15.5 करोड़ रुपये थी. फिर सरकार ने नए ट्रस्ट को शुरुआती 11 लाख रुपये का लोन दिया. इन पैसों में से 6 लाख रुपये से सोने का नया अर्घा बनवाया गया. बाकी बचे 5 लाख रुपये बैंक में जमा कर दिए गए. इसका मकसद था कि रोजाना के खर्चों के लिए मंदिर मैनेजमेंट को ब्याज मिल सके.
पहले और बाद के मंदिर के हालात
समाज कल्याण मंत्री गुलाब सेहरा ने जब बिल पेश किया तो उन्होंने मंदिर के पहले के हालातों को बयां किया था. उन्होंने कहा कि पुजारियों को महीने में केवल 8 रुपये और खाना मिलता था. वह कहते यह एक तरह से उनके लिए बंधुआ मजदूरी थी. नए मैनेंजमेंट ने पुजारियों की सैलरी बढ़ा दी और उसे 300 रुपये प्रतिमाह कर दिया. और दोपहर में तो खाना उन्हें दिया ही जाता रहा. साथ ही मंदिर के ढांचे में भी सुधार किए गए. बेहतर रोशनी और हवा पानी के लिए करीब 20 ट्यूबलाइट और 11 पंखे लगाए गए. साफ सफाई को प्राथमिकता दी गई और शिवलिंग पर चढ़ाए गए दूध को अनाथों में बांटा गया. हर सोमवार को 51 संन्यासियों और रोजाना 30 गरीब लोगों को खाना खिलाया जाता था. यह भी फैसला लिया गया कि जो परिवार 5000 रुपये या उससे ज्यादा का दान करेंगे, उन्हें साल में एक बार गर्भगृह यानि मुख्य पूजा स्थल के अंदर पूजा करने का मौका दिया जाएगा. पहला बड़ा योगदान तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी का था. कुछ ही महीनों में 1 लाख रुपये जमा हो गए. मंदिर के पास एक पुलिस पोस्ट बनाकर सुरक्षा बढ़ाई गई.
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I currently serve as a Senior Assistant Editor at News18 Hindi, leading State & Local18 operations across Uttar Pradesh, Uttarakhand, Delhi, Himachal Pradesh and Haryana. With over 17 years of experience in jou…और पढ़ें