सब्जी नहीं, ये आफत…कागजों में सिमटी PTR की सख्ती, बाजार में खुलेआम बिक रही ‘जंगल की बर्बादी’
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Pilibhit Tiger Reserve : बीते दिनों पीलीभीत टाइगर रिजर्व की ओर से इसकी खरीद-फरोख्त को लेकर एडवाइजरी जारी की गई थी. लेकिन यह एडवाइजरी कागजों में सिमट कर रह गई है.
पीलीभीत. बीते दिनों पीलीभीत टाइगर रिजर्व प्रशासन ने कटरुआ की खरीद फरोख़्त को लेकर एडवाइजरी जारी की. लेकिन यह एडवाइजरी महज कागजों में सिमट कर रह गई है. रोकथाम के दावों के बीच बाजार में कटरुआ की बिक्री बेरोकटोक जारी है. पीलीभीत और लखीमपुर के जंगलों में कटरुआ नामक सब्जी पाई जाती है. यह सब्जी साल के पेड़ों की जड़ों में पैदा होती है. यह बारिश के बाद उगना शुरू होती है. जंगल के आसपास रहने वाले ग्रामीण जंगल में घुसपैठ कर जमीन खोदकर इस सब्जी को निकालते हैं. इसके बाद इसे मंडी पहुंचाया जाता है, जहां यह महंगे दामों में बिकती है. इस सब्जी के शौकीनों का मानना है कि इसका स्वाद किसी नॉन वेजिटेरियन फूड से भी अधिक होता है. यही कारण है कि लोग 1600-2000 रुपए प्रति किलो की कीमत में भी से खरीदने को तैयार रहते हैं. इस समय कटरुआ 1000 रुपए प्रति किलो बिक रहा है.
टाइगर रिजर्व में किसी भी व्यक्ति का अवैध रूप से प्रवेश करना गैरकानूनी है. लेकिन वन विभाग की सांठ-गांठ से न केवल लोग पीलीभीत टाइगर रिजर्व में प्रवेश करते हैं बल्कि वन उपज को एकत्र कर इस्तेमाल करते हैं. सालभर जंगल में घुसकर लकड़ी व घास की तस्करी तो जारी रहती ही है. बरसात के मौसम में जंगल में पाए जाने वाले मशरूम (कटरुआ और धरती के फूल) जंगलों से निकालकर बाकायदा मंडी लगाकर बेचे जाते हैं. पीलीभीत शहर में स्टेशन चौराहे पर शाम होते ही कटरुआ का बाजार सज जाता है.
जंगल में प्रवेश कर उसमें छेड़छाड़ करना न केवल वन्यजीव बल्कि इंसानों के लिए भी खतरनाक है. शहर में खुलेआम कटरुआ बिक रहा है, मगर वन विभाग के आला अधिकारियों की ओर से महज एक अपील/चेतावनी जारी कर रस्म अदायगी कर दी गई है.