अब मुश्किल परिस्थितियों में भी होगी खेती, डीडीयू के शोध से बदलेगी किसानी

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अब मुश्किल परिस्थितियों में भी होगी खेती, डीडीयू के शोध से बदलेगी किसानी


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Gorakhpur news: इस उपलब्धि के पीछे ‘DDUG’ की टीम के अलावा हैदराबाद विश्वविद्यालय, राजाजी कॉलेज तमिलनाडु और आईआईएसआर-वाराणसी जैसी संस्थाओं का भी योगदान रहा है. जैव प्रौद्योगिकी विभाग के प्रमुख प्रो. दिनेश यादव क…और पढ़ें

हाइलाइट्स

  • विषम परिस्थितियों में हो पाएगी खेती.
  • यह शोध ‘नेचर साइंटिफिक रिपोर्ट्स’ में प्रकाशित हुआ है.
  • शोध कार्य पिछले तीन वर्षों से चल रहा था.

गोरखपुर: परंपरागत मोटे अनाजों को अब नई वैज्ञानिक तकनीक के जरिए एक नया जीवन मिलने जा रहा है. दीनदयाल उपाध्याय गोरखपुर विश्वविद्यालय (DDUG) के जैव प्रौद्योगिकी विभाग की शोध टीम ने रागी जैसे पारंपरिक मोटे अनाज में ऐसा खास जीन खोज निकाला है, जो सूखा और खारेपन जैसी विपरीत परिस्थितियों में भी पौधों को जीवित रहने में सक्षम बनाता है.

नेचर साइंटिफिक रिपोर्ट्स में प्रकाशित

यह शोध ‘नेचर साइंटिफिक रिपोर्ट्स’ में प्रकाशित हुआ है और इसे कृषि और खाद्य सुरक्षा की दिशा में एक क्रांतिकारी कदम माना जा रहा है. वैज्ञानिकों का कहना है कि यह जीन न केवल रागी जैसी फसलों को बचाने में सहायक होगा, बल्कि अन्य प्रमुख फसलों में भी यह परिवर्तन लाकर जलवायु परिवर्तन के संकट का सामना करने में मदद करेगा.

कैन्डिडेट जीन की पहचान

इस शोध का मुख्य फोकस रहा ऐसे जीन की पहचान करना, जो पौधों को विषम परिस्थितियों में सहनशील बनाए. शोधकर्ताओं ने ‘कैन्डिडेट जीन’ की पहचान की है, जिसे अन्य फसलों में जोड़कर सूखा और खारापन झेलने लायक बनाया जा सकता है. इससे किसानों को बदलते मौसम और बंजर होती ज़मीन में खेती के नए विकल्प मिल सकते हैं.

हाईटेक टेक्नोलॉजी का इस्तेमाल

शोध में इको-MSRR और एन-1 नामक प्रमुख जीन को पहचाना गया है. जो पौधों को सूखे और खारेपन के प्रति सहनशील बनाते हैं. इसके अलावा बायोइंफॉर्मेटिक्स और कंप्यूटेशनल तकनीकों के माध्यम से भी जीन की बारीकी से जांच की गई है.

इस उपलब्धि के पीछे ‘DDUG’ की टीम के अलावा हैदराबाद विश्वविद्यालय, राजाजी कॉलेज तमिलनाडु और आईआईएसआर-वाराणसी जैसी संस्थाओं का भी योगदान रहा है. जैव प्रौद्योगिकी विभाग के प्रमुख प्रो. दिनेश यादव के नेतृत्व में यह शोध कार्य पिछले तीन वर्षों से चल रहा था.

आज जबकि जलवायु परिवर्तन का संकट गहराता जा रहा है, ऐसे समय में गोरखपुर से आई यह खबर सिर्फ एक शोध नहीं, बल्कि भारत की कृषि को आत्मनिर्भर और जलवायु अनुकूल बनाने की दिशा में एक बड़ी उम्मीद है.

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