गांव के खाली खेत और तालाब से कैसे बनाएं सोने की खान? जानिए मछली पालन का तरीका
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खेती-बाड़ी का मतलब अब सिर्फ गेहूं-धान तक ही नहीं रह गया है. गांव का तालाब या खाली खेत भी आपको मोटी कमाई करा सकता है. मछली पालन आज किसानों और युवाओं के लिए नई कमाई का जरिया बन चुका है. रोहू, कतला, कालबासु जैसी मछलियां और झींगा ऐसी हैं जिनकी बाजार में हमेशा तगड़ी डिमांड रहती है. थोड़ी सी ट्रेनिंग और सही देखभाल से कोई भी इसे अपनाकर अपनी जेब भर सकता है.

रोहू भारत में सबसे ज्यादा खाई जाने वाली मछलियों में से एक है. इसका स्वाद हल्का और हड्डियां कम होती हैं, इसलिए बाजार में इसकी खूब डिमांड रहती है. सही देखभाल में यह 8–10 महीने में डेढ़ से दो किलो तक वजन पकड़ लेती है.

कतला अपने बड़े आकार और तेज़ी से बढ़ने के लिए मशहूर है. यह ऊपर की सतह पर रहकर खाना खाती है और एक साल में 3–4 किलो तक वजन पकड़ सकती है. बड़े आकार और स्वाद के कारण होटलों और शादी-ब्याह के खाने में इसकी खास मांग रहती है.

कालबासु को ब्लैक कार्प भी कहा जाता है और यह दिखने में काली चमक वाली होती है. इसकी खासियत यह है कि यह पानी की गंदगी को भी खा लेती है, जिससे तालाब साफ-सुथरा रहता है. बाजार में इसे प्रोटीन से भरपूर मछली के रूप में बेचा जाता है, इसलिए किसान इसे रोहू और कतला के साथ ही पालते हैं.

झींगा पालन तटीय इलाकों में सोने पर सुहागा साबित होता है. थोड़े समय में ही यह बाजार में हजारों रुपये किलो बिकता है और निर्यात में इसकी सबसे ज्यादा डिमांड है. यही कारण है कि झींगा को कैश क्रॉप ऑफ फिशरीज कहा जाता है.

इन मछलियों को पालने के लिए ज्यादा खर्च की जरूरत नहीं होती. तालाब की सही सफाई, संतुलित चारा और नियमित देखभाल से यह काम आसान हो जाता है. किसान और युवा थोड़ी सी ट्रेनिंग लेकर इसे शुरू कर सकते हैं और अच्छी आमदनी कमा सकते हैं.

भारत ही नहीं, विदेशों में भी रोहू, कतला और झींगा की भारी मांग रहती है. शादी-ब्याह, होटलों और रोज़मर्रा के खाने में मछली हमेशा शामिल रहती है. ऐसे में किसान को अपनी मछली बेचने के लिए बाजार की कभी कमी नहीं पड़ती.

सरकार भी मछली पालन को बढ़ावा देने के लिए योजनाएं चला रही है. सब्सिडी और ट्रेनिंग की मदद से गांव का कोई भी युवा इस काम की शुरुआत कर सकता है. खेती-बाड़ी का यह नया तरीका आने वाले समय में रोजगार और कमाई का बड़ा जरिया बन रहा है.