गाजीपुर में 50 साल पुरानी दुकान पर 20 साल से मिल रहा शाही टुकड़ा, जिसका स्वाद है लाजवाब

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गाजीपुर में 50 साल पुरानी दुकान पर 20 साल से मिल रहा शाही टुकड़ा, जिसका स्वाद है लाजवाब


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गाजीपुर में 50 साल पुरानी दुकान पर 20 साल से शाही टुकड़ा लोगों को लुभा रहा है. इसकी पारंपरिक रेसिपी में पाव रोटी, चाशनी, रबड़ी और खोवा शामिल हैं. रोजाना सैकड़ों लोग इसका स्वाद लेने आते हैं. इसकी तैयारी किसी शाही दावत से कम नहीं पाव रोटी को तलने से लेकर, चाशनी में पकाने और फिर ऊपर से ताजी रबड़ी, खोवा और रसमलाई के स्वाद वाली मलाई डालने तक की प्रक्रिया पूरी तरह पारंपरिक है. दुकान संचालक बताते हैं कि शाही टुकड़ा बनाने के लिए पहले पावर ब्रेड को छोटे टुकड़ों में काटकर देसी घी में सुनहरा तला जाता है, इसके बाद चीनी की चाशनी में डुबोया जाता है

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गाजीपुरः शाही टुकड़ा का नाम सुनते ही लोगों के मन में हैदराबाद या पुरानी दिल्ली का स्वाद याद आता है, लेकिन गाजीपुर के टाउन हॉल तिराहे के पास पिछले 20 साल से यही मिठाई लोगों को आकर्षित कर रही है. लगभग 50 साल पुरानी इस दुकान पर रोजाना सैकड़ों लोग शाही टुकड़े का स्वाद लेने पहुंचते हैं. टाउन हॉल तिराहे के पास स्थित यह 50 साल पुरानी दुकान सिर्फ एक दुकान नहीं, बल्कि गाजीपुर के जायके की एक रूह है. यहाँ पिछले 20 सालों से जो शाही टुकड़ा’ मिल रहा है, उसका स्वाद शहर में और कहीं नहीं मिलता.

रेसिपी ऐसे करते हैं तैयार

इसकी तैयारी किसी शाही दावत से कम नहीं पाव रोटी को तलने से लेकर, चाशनी में पकाने और फिर ऊपर से ताजी रबड़ी, खोवा और रसमलाई के स्वाद वाली मलाई डालने तक की प्रक्रिया पूरी तरह पारंपरिक है. दुकान संचालक बताते हैं कि शाही टुकड़ा बनाने के लिए पहले पावर ब्रेड को छोटे टुकड़ों में काटकर देसी घी में सुनहरा तला जाता है, इसके बाद चीनी की चाशनी में डुबोया जाता है. ठंडा होने पर ऊपर से ताज़ी रबड़ी, खोवा और ड्राई फ्रूट्स डाले जाते हैं, जिससे इसका स्वाद रसमलाई जैसा हो जाता है. शाही टुकड़े का आधार पाव रोटी होती है, जो तलने के बाद कुरकुरी  हो जाती है. जब इसके ऊपर गाढ़ी रबड़ी डाली जाती है, तो वह रोटी के अंदर तक जाकर उसे नरम  बनाती है, जबकि खोवा  अपनी दानेदार बनावट के कारण एक रिच और क्रीमी एहसास देता है. यह क्रिस्पी और सॉफ्ट का कॉम्बिनेशन ही खाने वाले को पहली बाइट में दीवाना बना देता है.

शुभ कार्यों पर किया जाता है बुक

दुकानदार के अनुसार इस मिठाई को बनाने की कला उन्हें उनके वालिद साहब से विरासत में मिली है.उनका कहना है. कारीगरी सिखाई नहीं जाती, जैसे मछली पानी में तैरना सीख जाती है, वैसे ही काम करते-करते हुनर आ जाता है. रोजाना लगभग 300 से 400 शाही टुकड़े केवल 4 से 5 घंटे में बिक जाते हैं. वहीं शादी-ब्याह और बड़े आयोजनों में एक दिन में 1000 पीस तक तैयार किए जाते हैं.

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Rajneesh Kumar Yadav

मैं रजनीश कुमार यादव, 2019 से पत्रकारिता से जुड़ा हूं. तीन वर्ष अमर उजाला में बतौर सिटी रिपोर्टर काम किया. तीन वर्षों से न्यूज18 डिजिटल (लोकल18) से जुड़ा हूं. ढाई वर्षों तक लोकल18 का रिपोर्टर रहा. महाकुंभ 2025 …और पढ़ें



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