जिस स्कूल के बच्चों ने कभी नॉर्वे की PM का किया था स्वागत, आज वही गायब
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Ajabpur Primary School Reality : सोचिए जिस स्कूल के बारे में हर जगह बात हो रही थी, वो ही गायब हो जाए तो? जी हां सुनने में आपको अजीब लगेगा, पर ये सच है. गाजियाबाद के एक स्कूल अजबपुर ने नार्वे के पीएम का 2019 में ऐसा स्वागत किया था कि हर जगह चर्चा होने लगी थी. मगर, आज वो स्कूल बंद पड़ा है और वहां के बच्चे रामलीला मैदान में पड़ रहे हैं.
गाजियाबाद स्कूल की हालत जर्जर.
गाजियाबाद: कभी जिस सरकारी स्कूल की गूंज विदेश से तक पहुंची थी, आज उसी के हाल बेहाल हैं. साल 2019 में जब नॉर्वे की प्रधानमंत्री एर्ना सोलबर्ग भारत आई थीं, तब मुरादपुर के अजबपुर प्राथमिक विद्यालय के बच्चों ने बैंड बजाकर उनका स्वागत किया था. उस समय स्कूल की खूब तारीफ हुई, इसे मॉडल स्कूल बनाया गया. सुविधाएं भी मिलीं. नए बेंच आए, मिड-डे मील के लिए पक्का डाइनिंग एरिया बना और दाखिलों की संख्या भी बढ़ गई. मगर, आज उसी स्कूल की तस्वीर पूरी तरह बदल गई है.
रामलीला मैदान बना नया स्कूल
टाइम्स ऑफ इंडिया की रिपोर्ट के अनुसार, करीब 8 महीने पहले यानी पिछले साल नवंबर में स्कूल की इमारत को जर्जर और खतरनाक बताकर बंद कर दिया गया. बच्चों से कहा गया था कि जल्द ही मरम्मत होगी और वे वापस अपनी कक्षाओं में लौटेंगे. आज तक न तो काम शुरू हुआ और न ही कोई नई इमारत बनी. अब बच्चे करीब 3 किलोमीटर दूर एक रामलीला मैदान में पढ़ने जाते हैं.
एक छोटे से हॉल में कुछ बच्चे बैठते हैं, जबकि बाकी बच्चे पेड़ की छांव और खुले मैदान में चटाई बिछाकर पढ़ाई करते हैं. तेज धूप हो, बारिश हो या उमस, पढ़ाई इसी तरह चलती है. चौथी कक्षा के करीब 20 बच्चे हॉल में पढ़ते हैं, जबकि पहली, दूसरी, तीसरी और पांचवीं के छात्र-छात्राएं मैदान में चटाई बिछाकर पढ़ाई करते हैं. तेज धूप, बारिश और मौसम की मार के बीच भी बच्चों का स्कूल नहीं रुकता.
पर्दा ही बन गया ब्लैकबोर्ड
स्कूल की प्रधानाध्यापिका सुमन ने भी हार नहीं मानी. उन्होंने कमरे में लगे पर्दे पर अंग्रेजी के अक्षर, पक्षियों और दूसरी तस्वीरें छपवा दीं, ताकि बच्चों की पढ़ाई रुके नहीं. जब ब्लैकबोर्ड और दीवारें नहीं रहीं, तो वही पर्दा बच्चों का सहारा बन गया.
मुश्किलों के बीच भी बच्चों ने रचा इतिहास
सबसे बड़ी बात यह है कि इतनी परेशानियों के बाद भी बच्चों का हौसला नहीं टूटा. इस साल यह स्कूल गाजियाबाद के सिर्फ सात सरकारी स्कूलों में शामिल हुआ, जिन्हें निपुण (NIPUN) प्रमाणन मिला. स्कूल के बच्चों ने राष्ट्रीय जलवायु सम्मेलन में हिस्सा लिया, राज्य स्तरीय जूनियर खेल प्रतियोगिताओं में स्वर्ण और रजत पदक जीते और हिंदी ओलंपियाड में भी शानदार प्रदर्शन किया.
जिस स्कूल के बच्चे कभी अंतरराष्ट्रीय मेहमानों के स्वागत का चेहरा बने थे, आज वही बच्चे खुले आसमान के नीचे शिक्षा पाने को मजबूर हैं. उनकी मेहनत और शिक्षकों की लगन ने तो उम्मीद की लौ जला रखी है, लेकिन सवाल यह है कि आखिर इन मासूमों को अपनी ही कक्षाओं में लौटने के लिए और कितने दिनों तक इंतजार करना पड़ेगा?
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Kavya Mishra is working with News18 Hindi as a Senior Sub Editor in the regional section (Uttar Pradesh, Uttarakhand, Haryana and Himachal Pradesh). Active in Journalism for more than 7 years. She started her j…और पढ़ें