जो रईसी की पहचान थी, आज कोई पूछने वाला नहीं…गाजीपुर में आखिरी सांस ले रही तांत बुनाई

0
जो रईसी की पहचान थी, आज कोई पूछने वाला नहीं…गाजीपुर में आखिरी सांस ले रही तांत बुनाई


Last Updated:

Ghazipur News : गाजीपुर के पीजी कॉलेज में 80 साल के नान्हू पिछले कई दशकों से तांत की बुनाई कर रहे हैं. उन्होंने यह हुनर कोलकाता में सीखा. आज यह कला दम तोड़ रही है, नानू अब भी इसे जिंदा रखे हुए हैं. उनकी बनाई कुर्सी 1600 रुपये तक बिकती है, लेकिन प्लास्टिक के दौर में इसकी मांग लगातार घट रही है. उनकी कुर्सी पर चार से पांच लोग आराम से बैठ सकते हैं. लोकल 18 से नान्हू कहते हैं कि उन्होंने यह काम किसी स्कूल या उस्ताद से नहीं सीखा.

गाजीपुर. पीजी कॉलेज के एक कोने में बैठा एक बुजुर्ग अपने हाथों से धीरे-धीरे एक कुर्सी बुन रहा है. लकड़ी के फ्रेम पर सफेद तांत की महीन जाल बुनती उसकी उंगलियां एक परंपरा को जिंदा रखे हुए हैं. 80 साल के नान्हू शायद इस शहर के आखिरी बुनकरों में से एक हैं. आज के प्लास्टिक और फोम वाले दौर में जहां कुर्सियां सिर्फ आराम का साधन हैं, गाजीपुर के पीजी कॉलेज के एक कोने में आज भी तांत बुनाई होती है, जो कभी रईसी की पहचान हुआ करती थी. लोकल 18 से नान्हू बताते हैं कि उन्होंने यह काम किसी स्कूल या उस्ताद से नहीं सीखा. साल 1980 के दशक में उन्होंने कोलकाता में एक कारीगर को बुनाई करते देखा और महज नजर से देखकर पूरा हुनर सीख लिया. 1988 में जब वे नंदगंज में नौकरी करते थे, तब उन्हें ₹1000 महीना मिलता था, लेकिन आज वे गाजीपुर पीजी कॉलेज की उन ऐतिहासिक कुर्सियों को नया जीवन दे रहे हैं जो अब कहीं और नहीं मिलतीं.

100 ग्राम तांत, 2 घंटे बुनाई

नान्हू की बनाई कुर्सी साधारण नहीं होती. एक ऐसी कुर्सी, जिस पर चार से पांच लोग आराम से बैठ सकते हैं. वे बताते हैं कि एक कुर्सी बनाने में करीब दो से ढाई घंटे लगते हैं और 100–150 ग्राम तांत का इस्तेमाल होता है. इस तांत को वे स्थानीय कारीगरों से लेते हैं. लागत करीब 50 रुपये आती है, जबकि मजदूरी 400 रुपये मिलती है. पूरी कुर्सी तैयार होकर 1600 रुपये तक बिक जाती है. उनके पास एक छोटा सा चाकू और तांत का बंडल होता है, जिससे वे ऐसी जादुई बुनाई करते हैं कि कुर्सी के ऊपर-नीचे से हवा आर-पार हो जाती है. नान्हू के मुताबिक, यह कुर्सियां 4 साल तक टस से मस नहीं होतीं।

बदलते वक्त की मार

दुख की बात यह है कि अब इस हुनर को सीखने वाला कोई नहीं है. नान्हू बताते हैं कि अब लोग लकड़ी और प्लास्टिक की कुर्सियों की तरफ भाग रहे हैं. जिस तांत को वे गाजीपुर के एक स्थानीय मुसलमान भाई से लाते हैं, उसकी चमक अब फीकी पड़ रही है क्योंकि मांग घट गई है।. पीजी कॉलेज में आज भी वो 4-सीटर कुर्सियां मौजूद हैं जिन्हें बिनने के लिए नान्हू जैसे हुनरमंद की जरूरत पड़ती है. गाजीपुर में अब यह काम लगभग खत्म हो चुका है. पीजी कॉलेज शायद उन आखिरी जगहों में से एक है, जहां यह कला अब भी सांस ले रही है.

About the Author

Priyanshu Gupta

प्रियांशु गुप्‍ता बीते 10 साल से भी ज्यादा समय से पत्रकारिता में सक्रिय हैं. 2015 में भारतीय जनसंचार संस्थान (IIMC), दिल्ली से जर्नलिज्म का ककहरा सीख अमर उजाला (प्रिंट, नोएडा ऑफिस) से अपने करियर की शुरुआत की. य…और पढ़ें



Source link

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *