तबला वादक लच्छू महाराज का भी था दालमंडी से नाता, यहीं करते थे रियाज.. जानें कहानी

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तबला वादक लच्छू महाराज का भी था दालमंडी से नाता, यहीं करते थे रियाज.. जानें कहानी


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लच्छू महाराज का पुराना घर भी दालमंडी में ही था. अपने इस पुराने घर की पहली मंजिल पर लच्छू महाराज हर रोज रियाज किया करते थे. दालमंडी में बचपन बिताने वाले शकील अहमद ‘जादूगर’ ने बताया कि हर रोज सुबह 7 बजे से दोपहर 12 बजे तक लच्छू महाराज अपने घर पर एकांत साधना कर तबले का रियाज़ किया करते थे.

वाराणसी के दालमंडी से जुड़े कई किस्से कहानियां हैं. बनारस संगीत घराने से जुड़े कई नामचीन हस्तियां भी कभी यहां रहते थे. वर्तमान में इस जगह को पूर्वांचल के बड़े बाजार के तौर पर जाना जाता है, लेकिन कभी यहां शाम ढलने के साथ नृत्य, संगीत की कभी महफ़िल सजती थी. यह जगह उस समय वाराणसी के सांस्कृतिक केंद्र के तौर पर पूरे देश में जानी जाती थी. विश्व प्रसिद्ध तबला वादक लच्छू महाराज का भी दालमंडी से नाता रहा है. लच्छू महाराज फ़िल्म अभिनेता गोविंदा के मामा थे.

लच्छू महाराज का पुराना घर भी दालमंडी में ही था. अपने इस पुराने घर की पहली मंजिल पर लच्छू महाराज हर रोज रियाज किया करते थे. दालमंडी में बचपन बिताने वाले शकील अहमद ‘जादूगर’ ने बताया कि हर रोज सुबह 7 बजे से दोपहर 12 बजे तक लच्छू महाराज अपने घर पर एकांत साधना कर तबले का रियाज़ किया करते थे.

मोमबत्ती की रोशनी में करते थे साधना
बड़ी बात ये थी कि जिस कमरे में वो रियाज़ करते थे वहां न तो लाइट थी और न ही पंखा….मौसम कोई भी हो वो मोमबत्ती की हल्की रोशनी में ही अपनी साधना को करते थे. उनका कहना था कि तकलीफ को सहकर ही साधना करने पर उसका पूरा फल मिलता है. वो जब 12 साल के थे तब से यहां रियाज करते थे. रियाज के समय वो कमरे में अकेले ही रहते थे. उनके तबले से निकलने वाली आवाज ताक-धिन धिन्ना की आवाज गूंजती थी, तो हर कोई इस आवाज की ओर खींचा चला आता था.

अब है मार्केटिंग कॉम्प्लेक्स
स्थानीय लोग बताते हैं जहां कभी लच्छू महाराज का घर था आज वहां मार्केटिंग कॉम्पलेक्स बन गया है.इस कॉम्प्लेक्स में कई दुकानें है. लोग इसे राजपूत कटरे के नाम से जानते हैं. फिलहाल, अब जब दालमंडी की सड़क चौड़ी हो रही है जो अब कुछ वक्त बाद इतिहास बन जाएगी.

सजती थी तवायफों की महफिल

इस गली में कभी तवायफों की महफिल सजती थी उस वक्त यहां बड़े-बड़े राजा-महाराजा और नामचीन धन्ना सेठ भी आते थे. इस गली में नरगिस की मां जद्दनबाई, हुस्नाबाई, तौकीबाई, जानकी बाई, गौहर जान, रसूलन बाई, सिद्धेश्वरी देवी और छप्पन छुरी जैसी नामचीन तवायफें रहती थी, जिनकी एक झलक पाने के लिए लोग बेताब रहते थे. आधुनिक हिंदी के जाने-माने साहित्यकार भारतेंदु हरिश्चंद्र भी यहां के एक नर्तकी के दीवाने थे. कहा जाता है कि वो उससे मिलने वक्त बेवक्त यहां चले आते थे.

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Vivek Kumar

विवेक कुमार एक सीनियर जर्नलिस्ट हैं, जिन्हें मीडिया में 10 साल का अनुभव है. वर्तमान में न्यूज 18 हिंदी के साथ जुड़े हैं और हरियाणा, उत्तर प्रदेश और उत्तराखंड की लोकल खबरों पर नजर रहती है. इसके अलावा इन्हें देश-…और पढ़ें

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