मचान विधि से करेला की खेती को कितना फायदा? 60 साल के किसान ने बताया सीक्रेट
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Karela ki kheti : 60 वर्ष की उम्र पार कर चुके कामता सिंह आज भी पूरी मेहनत के साथ खेतों में काम करते हैं. वे इस समय तीन बीघा में मचान विधि से करेला की खेती कर रहे हैं. दूर-दूर तक फैली बेलों पर लगे करेलों को देखकर उनकी मेहनत का अंदाजा लगाया जा सकता है. लोकल 18 से लखीमपुर खीरी का ये किसान कहता है कि मचान विधि से फल की गुणवत्ता बेहतर होती है और उत्पादन भी अधिक मिलता है. इससे लागत आसानी से निकल जाती है. किसान कामता के अनुसार, वे करेला बेचकर प्रतिदिन 2000 रुपये तक का मुनाफा कमा रहे हैं.
लखीमपुर खीरी. जहां एक ओर कई किसान आज भी पारंपरिक खेती पर निर्भर हैं, लखीमपुर खीरी जिले के किसान कामता सिंह ने अलग रास्ता बनाया है. उन्होंने सब्जी की खेती को अपनी सफलता का माध्यम बना लिया है. 60 वर्ष की उम्र पार कर चुके कामता सिंह आज भी पूरे उत्साह और मेहनत के साथ खेतों में काम कर रहे हैं. उनकी लगन और आधुनिक खेती की सोच उन्हें क्षेत्र के अन्य किसानों से अलग पहचान दिला रही है. किसान कामता इस समय लगभग तीन बीघा भूमि में मचान विधि से करेला की खेती कर रहे हैं. उनके खेत में तैयार हरे-भरे करेला की फसल देखने लायक है. दूर-दूर तक फैली बेलों पर लगे करेलों को देखकर उनकी मेहनत का अंदाजा लगाया जा सकता है. किसान कामता का कहना है कि मचान विधि अपनाने से पौधों का बेहतर विकास होता है, फसल को पर्याप्त धूप और हवा मिलती है, रोगों का प्रकोप भी कम हो जाता है.
पूरे सीजन मांग
कामता सिंह के मुताबिक, वह पिछले कई वर्षों से लगातार सब्जियों की खेती कर रहे हैं, लेकिन उन्हें सबसे अधिक फायदा करेला की खेती में मिला है. अनुभव के आधार पर उन्होंने पाया कि करेला एक ऐसी फसल है जिसकी बाजार में लगभग पूरे सीजन मांग बनी रहती है. यही कारण है कि उन्होंने इस बार भी बड़े क्षेत्र में करेला की खेती की है.
शुरू में लागत ज्यादा…
कामता सिंह बताते हैं कि मचान विधि में शुरुआती लागत थोड़ी अधिक आती है, लेकिन इसका लाभ पूरे सीजन मिलता है. इस तकनीक से फल की गुणवत्ता बेहतर होती है और उत्पादन भी अधिक मिलता है, जिससे लागत आसानी से निकल जाती है. उनकी सफलता को देखकर आसपास के कई किसान भी अब मचान विधि से सब्जी की खेती करने के लिए प्रेरित हो रहे हैं. किसान कामता के अनुसार उन्हें करेला बेचकर प्रतिदिन लगभग 2000 रुपये तक का मुनाफा हो रहा है. स्थानीय मंडियों और बाजारों में करेला की अच्छी मांग होने के कारण उन्हें अपनी उपज का उचित मूल्य मिल जाता है.
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प्रियांशु गुप्ता बीते 10 साल से भी ज्यादा समय से पत्रकारिता में सक्रिय हैं. 2015 में भारतीय जनसंचार संस्थान (IIMC), दिल्ली से जर्नलिज्म का ककहरा सीख अमर उजाला (प्रिंट, नोएडा ऑफिस) से अपने करियर की शुरुआत की. य…और पढ़ें