17 साल का बेटा बिजली के तारों का शिकार, फिर आयुष्मान कार्ड से 75 हजार का घपला
बलिया: आज हम आपको जिले में गरीबी से जूझ रहे एक परिवार की दर्दनाक कहानी बताने और दिखाने जा रहे हैं, जिसने आज सिस्टम पर कई सवाल खड़े कर दिए हैं. हाईस्कूल की परीक्षा दे रहा एक 17 वर्षीय छात्र बेहतर भविष्य के सपने देख रहा था, लेकिन गांव के ही रहने वाला एक शख्स की लापरवाही ने उसकी जिंदगी बेहाल कर दी है. अब परिवार बेटे के दर्द, कर्ज के बोझ और व्यवस्था के कथित भ्रष्टाचार के बीच न्याय की गुहार रो-रोकर लगा रहा है. इस पीड़ित परिवार के साथ जो हुआ है, यकीन मानिए आपके दिलों को भी झकझोर देगा. हालांकि, फिलहाल बच्चे एक पूरा अंग बेकार हो गया है और दोनों पैर जल गए हैं. आइए विस्तार से जानते हैं…
पीड़ित 17 वर्षीय शुभम की मां रिंकू देवी रोते-बिलखती बोलीं कि वह जनपद बलिया के सुखपुरा थाना क्षेत्र अंतर्गत मिड्ढा गांव की रहने वाली हैं. खेत में सीसीटीवी लगाने के काम के लिए गांव के ही रहने वाले मुन्ना सिंह उनके नाबालिग बेटे को अपने साथ जबरिया लेकर चले गए. परिवार ने लाख मना भी किया कि शाम हो गया है, रहने दीजिए. लेकिन उनकी बात नहीं सुनी गई. काम के दौरान ही खेत में 11 हजार वोल्ट की हाईटेंशन लाइन की चपेट में आने से छात्र गंभीर रूप से झुलस गया. हालांकि, बच्चे को वह शख्स बचाने में असफल रहा. आसपास के लोगों की मदद से बच्चे को बचाया गया. बच्चे की स्थिति बहुत खराब होती जा रही है.
बलिया से ले जाना पड़ा BHU
शुभम के पिता राजू ने कहा कि लगभग रात साढ़े सात बजे उनके बेटे को काम पर ले जाया गया था कि छोटी-मोटी सहायता करना है. हादसे होने के तुरंत बाद आनन-फानन में उसे जिला अस्पताल बलिया पहुंचाया गया, जहां डेढ़ महीने तक इलाज चला. परिवार का आरोप है कि डॉक्टर ने कहा कि बेहतर इलाज के लिए बच्चे को BHU ले जाना पड़ेगा, तो गरीब परिवार आयुष्मान कार्ड को चालू कराने के लिए जिला अस्पताल में दिखाने ले आया था. लेकिन वहां भी उसके साथ धोखा हो गया.
खून चढ़ाने और इलाज के दौरान आयुष्मान कार्ड का इस्तेमाल कराया गया, लेकिन बाद में पता चला कि आयुष्मान कार्ड से लगभग 75 हजार रुपए उतार लिए गए हैं. पूछने पर परिवार को बताया गया है कि यह पैसा बाहर से मंगाई गई दवा और इंजेक्शन के लिए काटा गया है. हालांकि, जिला अस्पताल बाहर से दवाई लिखने के लिए शुरू से ही बदनाम रहा है. सरकारी अस्पताल में बाहर से दवा लिखना मना ही है.
गरीब परिवार से इतनी रकम क्यों ली गई?
अब बड़ा सवाल उठता है कि जब जिला अस्पताल सरकारी है, तो आखिर गरीब परिवार के आयुष्मान कार्ड से इतनी बड़ी रकम क्यों काटी गई? पीड़ित परिवार का आरोप है कि उन्हें कोई स्पष्ट जानकारी भी नहीं दी जा रही है. हालांकि, यह ऐसा पहला मामला सामने आया है. दूसरी ओर, जिस व्यक्ति के साथ लड़का काम पर गया था, उसने भी हादसे के बाद जिम्मेदारी से हाथ खड़ा कर दिया है. अब परिवार अपने बेटे को घर पर इलाज कर रहा है.
हालांकि, बेहतर इलाज के लिए लड़के को वाराणसी के लिए भी रेफर किया गया था. पिछले तीन महीनों से परिवार कर्ज में डूबा हुआ है. घर की आर्थिक हालत इतनी खराब है कि दो वक्त की रोटी जुटाना भी मुश्किल हो गया है. मां की आंखों से आंसू नहीं रुकते और पिता हर दरवाजे पर न्याय की उम्मीद लेकर भटक रहे हैं. पिता मजदूरी करते हैं और मां घर-घर में बर्तन साफ करती है.
परिवार को अब न्याय की दरकार
ध्यान देना भी जरूरी है कि यह मामला एक गरीब परिवार का नहीं है, बल्कि उन सवालों का आईना है, जो नाबालिगों से मजदूरी करवाने, हादसों की जिम्मेदारी तय करने और सरकारी स्वास्थ्य योजनाओं में पारदर्शिता पर उठ रहे हैं. प्रशासन को चाहिए कि पूरे मामले की निष्पक्ष जांच कर दोषियों पर कार्रवाई करे. आयुष्मान कार्ड से हुई कटौती की सच्चाई सामने लाए और पीड़ित परिवार को आर्थिक सहायता व न्याय दिला सके.