2007 की वो कहानी, जब पूरी दुनिया को पता चला- प्रतीक भी हैं मुलायम सिंह यादव के बेटे

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2007 की वो कहानी, जब पूरी दुनिया को पता चला- प्रतीक भी हैं मुलायम सिंह यादव के बेटे


prateek yadav was mulayam sing yadav son: प्रतीक यादव की अचानक हुई मौत ने न केवल यादव परिवार को, बल्कि उन तमाम चाहने वालों को झकझोर कर रख दिया है. जो उन्हें एक फिटनेस आइकन और बिजनेसमैन के तौर पर देखते थे. उनकी मौत से जुड़ी कई खबरें आप तक पहुंच चुकी होंगी, लेकिन आज इस दुखद घड़ी में हम आपको प्रतीक के जीवन की उस अनकही कहानी को बताने जा रहे हैं, जो भारतीय राजनीति के सबसे बड़े रहस्यों में से एक थी. साल 2007 से पहले, दुनिया के लिए मुलायम सिंह यादव का मतलब सिर्फ अखिलेश यादव था. किसी को कानो-कान खबर नहीं थी कि सैफई के इस कुनबे में एक और चिराग है, जिसे राजनीति की चकाचौंध से दूर रखा गया है. लेकिन एक अदालती हलफनामे ने उस सच को सार्वजनिक किया. जिसे दशकों तक छिपाकर रखा गया था. यह कहानी एक ऐसे बेटे की है जिसने अपनी पहचान के लिए लंबी खामोश लड़ाई लड़ी और अंततः सुप्रीम कोर्ट के एक कागज ने उन्हें वह नाम दिया, जिसके बाद वे रातों-रात उत्तर प्रदेश के सबसे चर्चित चेहरे बन गए.

साल 2007, एक अदालती कागज और सबसे बड़ा कुबूलनामा

बात साल 2007 की है, जब उत्तर प्रदेश की सियासत अपने चरम पर थी. उसी दौरान आय से अधिक संपत्ति (DA Case) के एक मामले ने मुलायम सिंह यादव की मुश्किलों को बढ़ा दिया था.  मीडिया रिपोर्ट के मुताबिक, ‌विश्वनाथ चतुर्वेदी की याचिका पर सुनवाई करते हुए सुप्रीम कोर्ट ने नेताजी से उनके परिवार का पूरा ब्योरा मांगा था. इसी कानूनी शिकंजे के बीच मुलायम सिंह यादव ने एक ऐसा हलफनामा दाखिल किया, जिसने पूरे देश को चौंका दिया. उस हलफनामे में पहली बार आधिकारिक तौर पर साधना गुप्ता को उनकी पत्नी और प्रतीक यादव को उनके बेटे के रूप में स्वीकार किया गया था. वह केवल एक कानूनी कागज नहीं था, बल्कि एक पिता का वह सार्वजनिक कुबूलनामा था जिसने प्रतीक को समाज में उनकी असली पहचान और यादव खानदान में उनका हक दिलाया.

स्कूल के रिकॉर्ड्स और पिता का नाम

प्रतीक यादव के शुरुआती साल काफी अलग थे. मीडिया रिपोर्ट्स और उस वक्त के दस्तावेजों की मानें तो प्रतीक के स्कूल सर्टिफिकेट्स और अन्य कागजातों में पिता के नाम की जगह पहले ‘चंद्र प्रकाश गुप्ता’ दर्ज था. चंद्र प्रकाश गुप्ता साधना गुप्ता के पहले पति थे. बताया जाता है कि इसके बाद मुलायम सिंह यादव ने इस स्थिति को बदलने के लिए कानूनी रास्ता अपनाया. उन्होंने लखनऊ के पास के एक गांव के ‘म्यूटेशन रिकॉर्ड्स’ में बदलाव करवाया और प्रतीक को कानूनी रूप से अपना नाम दिया. इस एक बदलाव ने प्रतीक की पूरी जिंदगी बदल दी. जो लड़का कल तक एक सामान्य छात्र की तरह पहचान की तलाश में था, वह अचानक से देश के सबसे बड़े राजनीतिक घराने का हिस्सा बन गया था.

साधना गुप्ता की वो खामोश तपस्या

प्रतीक यादव को उनका हक दिलाने के पीछे उनकी मां साधना गुप्ता का बहुत बड़ा संघर्ष रहा है. 80 के दशक से शुरू हुई यह कहानी 2007 में जाकर अपने अंजाम तक पहुंची थी. ‌ मीडिया में छपी रिपोर्ट के मुताबिक, साधना गुप्ता ने सालों तक पर्दे के पीछे रहकर मुलायम सिंह यादव का साथ दिया, लेकिन उन्होंने कभी अपने बेटे के हक से समझौता नहीं किया. 2003 में मुलायम की पहली पत्नी मालती देवी के निधन के बाद साधना गुप्ता का प्रभाव घर में बढ़ा, लेकिन उन्हें और प्रतीक को ‘राजकुमार’ का दर्जा उसी 2007 वाले हलफनामे के बाद मिला. प्रतीक को मुलायम के करीब लाने और उन्हें परिवार में स्थापित करने के लिए साधना गुप्ता ने हर राजनीतिक और पारिवारिक तूफान का सामना किया.

अखिलेश और प्रतीक: दो भाई, दो दुनिया

जब 2007 में दुनिया को पता चला कि प्रतीक भी मुलायम के बेटे हैं, तो सबसे ज्यादा चर्चा इस बात की हुई कि अखिलेश यादव का इस पर क्या रुख होगा. जहां अखिलेश राजनीति की कमान संभाल रहे थे, वहीं प्रतीक ने खुद को अखाड़े और सियासत से दूर रखा. दोनों भाइयों की दुनिया एकदम अलग थी. प्रतीक को जिम, महंगी कारों और रियल एस्टेट का शौक था. उन्होंने कभी भी समाजवादी पार्टी के मंचों पर जगह नहीं मांगी, लेकिन नेताजी के दिल में उनके लिए हमेशा एक नरम कोना रहा. प्रतीक की पहचान भले ही बाद में उजागर हुई, लेकिन मुलायम सिंह ने उन्हें वह हर सुख-सुविधा और प्यार दिया जो एक पिता अपने बेटे को दे सकता है.

नीली लैम्बोर्गिनी और समाजवाद का विवाद

प्रतीक यादव की पहचान केवल मुलायम के बेटे के तौर पर ही नहीं, बल्कि उनकी लग्जरी लाइफस्टाइल के लिए भी थी. जब उन्होंने ₹5 करोड़ की नीली लैम्बोर्गिनी खरीदी, तो पूरे देश की मीडिया में बहस छिड़ गई थी. विरोधियों ने सवाल उठाए कि समाजवाद का नारा देने वाले नेता का बेटा इतनी महंगी कार में कैसे घूम सकता है? उस वक्त भी प्रतीक ने बहुत ही बेबाकी से जवाब दिया था कि वे एक पेशेवर बिजनेसमैन हैं और अपना खर्च खुद उठाते हैं. वह हलफनामा जिसने उन्हें ‘यादव’ नाम दिया था, उसी ने उन्हें इस तरह की आलोचनाओं का सामना करने की ताकत भी दी थी. प्रतीक ने हमेशा यह साबित करने की कोशिश की कि वे अपनी पहचान अपने दम पर बनाना चाहते हैं.

विवादों के बीच अपर्णा यादव की एंट्री

प्रतीक यादव की कहानी में एक और मोड़ तब आया जब उनकी शादी अपर्णा यादव से हुई. अपर्णा ने प्रतीक के उलट राजनीति में गहरी दिलचस्पी दिखाई. अपर्णा के जरिए प्रतीक का परिवार फिर से सुर्खियों में रहने लगा. हालांकि प्रतीक पर्दे के पीछे ही रहे, लेकिन अपर्णा ने विधानसभा चुनाव लड़कर और बाद में भाजपा में शामिल होकर यह साफ कर दिया कि यादव परिवार की दूसरी शाखा भी उतनी ही प्रभावशाली है. आज प्रतीक की मौत के बाद अपर्णा और उनके परिवार पर दुखों का पहाड़ टूट पड़ा है, लेकिन लोग आज भी उस 2007 की घटना को याद कर रहे हैं जिसने इस पूरे परिवार की दिशा बदल दी थी.

एक अधूरे सफर का भावुक अंत

प्रतीक यादव की मौत के साथ ही मुलायम सिंह यादव की उस निजी विरासत का एक हिस्सा हमेशा के लिए खामोश हो गया है. 2007 में जिस ‘राजकुमार’ का परिचय दुनिया से हुआ था, उसका सफर इतनी जल्दी खत्म हो जाएगा, यह किसी ने नहीं सोचा था. वह हलफनामा आज भी सुप्रीम कोर्ट के रिकॉर्ड्स में मौजूद है, जो बताता है कि कैसे एक ताकतवर पिता ने अपने बेटे के लिए दुनिया भर के सवालों का सामना किया. प्रतीक भले ही आज हमारे बीच नहीं हैं, लेकिन यादव परिवार के इतिहास में उनका नाम उस बेटे के तौर पर दर्ज रहेगा जिसके लिए एक मुख्यमंत्री ने अपनी पूरी निजी जिंदगी को सार्वजनिक मंच पर रख दिया था.



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