40 साल से शेर अली गाजीपुर की कचहरी में लगा रहे बेल की दुकान, 3 रूपये गिलास से किया शुरू
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शेर अली लोकल 18 से बताते हैं कि आज भी वे उसी परंपरा को निभा रहे हैं. वे देशी और कागजी दोनों तरह के बेलों का उपयोग करते हैं. उनका मानना है कि अकेले कागजी बेल देखने में खूबसूरत भले ही लगे, लेकिन वह देशी बेल जैसा असर नहीं दिखाता. इसलिए, वे दोनों को मिलाकर शरबत तैयार करते हैं, जो पेट के लिए किसी रामबाण से कम नहीं है. उनका लक्ष्य मुनाफा कमाना नहीं, बल्कि लोगों को सस्ता और शुद्ध शरबत पिलाना है.
गाजीपुरः एक तरफ कचहरी की फाइलों का बेल (जमानत) है, तो दूसरी तरफ बेल का शरबत. गाजीपुर कचहरी के बाहर कुछ लोग कानूनी राहत पाने आते हैं, तो कुछ शेर अली के हाथों बने बेल के शरबत से अपने पेट को राहत देने. पिछले 40 सालों से शेर अली का यह शरबत लोगों के लिए सुकून का दूसरा नाम बन चुका है. उन्होंने 13 साल की उम्र में यह काम शुरू किया था, तब एक गिलास शरबत की कीमत मात्र तीन रुपये हुआ करती थी. आज चार दशक बाद भी उनकी दुकान पर भीड़ कम नहीं हुई है.
देशी और कागजी बेल का जादुई मिश्रण
शेर अली लोकल 18 से बताते हैं कि आज भी वे उसी परंपरा को निभा रहे हैं. वे देशी और कागजी दोनों तरह के बेलों का उपयोग करते हैं. उनका मानना है कि अकेले कागजी बेल देखने में खूबसूरत भले ही लगे, लेकिन वह देशी बेल जैसा असर नहीं दिखाता. इसलिए, वे दोनों को मिलाकर शरबत तैयार करते हैं, जो पेट के लिए किसी रामबाण से कम नहीं है. उनका लक्ष्य मुनाफा कमाना नहीं, बल्कि लोगों को सस्ता और शुद्ध शरबत पिलाना है, जिसमें प्रति गिलास मात्र एक-दो रुपये की ही बचत हो पाती है. देशी बेल का गूदा अधिक रेशेदार और औषधीय गुणों से भरपूर होता है, जो पाचन के लिए रामबाण है.वहीं, कागजी बेल अपनी पतली त्वचा और कम रेशों के लिए जानी जाती है, लेकिन इसमें देसी बेल की तुलना में औषधीय प्रभाव कम होता है.
गाजीपुर में बेल के बाग हुए कम
शहर के विकास और बदलती फिजाओं को करीब से देखने वाले शेर अली पुरानी यादों में खो जाते हैं. वे बताते हैं कि कभी शास्त्री नगर के पास 18 से 20 बीघे में बेल के बाग हुआ करते थे, जहाँ से ताजे फल मिल जाते थे. लेकिन अब उन बगीचों की जगह कंक्रीट के जंगल ने ले ली है.अब स्थिति यह है कि उन्हें करंडा और मैनपुर जैसे दूर-दराज के इलाकों में जाकर एक-एक बेल बिनकर लाना पड़ता है. शेर अली कहते हैं कि उनके ग्राहकों की तादाद में कोई खास कमी नहीं आई है. वे बताते हैं, पीने वाले पहले भी थे और आज भी हैं, बस 19-20 का फर्क आया है. एक दिन में वे औसतन 50 से 60 गिलास शरबत बेच लेते हैं.
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2002 में जनसंचार में स्नातक की डिग्री लेने के बाद पिछले अठारह वर्षों से ग्रामीण पत्रकारिता में सक्रिय. भारतीय प्रेस परिषद सहित पत्रकारिता से सबंधित अनेक राष्ट्रीय पुरस्कारों से सम्मानित. देश के सात राज्यों से ए…और पढ़ें