ये छोटा गांव बना, हॉकी फैक्ट्री, यहां से निकलते हैं फौजी‑पुलिस और ओलिंपियन!

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ये छोटा गांव बना, हॉकी फैक्ट्री, यहां से निकलते हैं फौजी‑पुलिस और ओलिंपियन!


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गाजीपुर के छोटे से गांव करमपुर में हॉकी की दिशा बदल रही थी. तेज बहादुर सिंह, जो कुश्ती के खिलाड़ी थे, ने लूंगी-बनियान में हॉकी खेलकर एक ऐसी शुरुआत की. जिसने करमपुर को हॉकी की नर्सरी में बदल दिया.

गाजीपुर: 1983 का वह साल, जब भारत क्रिकेट विश्व कप जीतकर जश्न मना रहा था. उसी दौरान गाजीपुर के छोटे से गांव करमपुर में हॉकी की दिशा बदल रही थी. तेज बहादुर सिंह, जो कुश्ती के खिलाड़ी थे, ने लूंगी-बनियान में हॉकी खेलकर एक ऐसी शुरुआत की. जिसने करमपुर को हॉकी की नर्सरी में बदल दिया.आज मेघबरन सिंह स्टेडियम न केवल सैकड़ों फौजियों और ओलंपियनों का गढ़ है, बल्कि यह गरीब बच्चों के लिए मुफ्त प्रशिक्षण और सपनों की उड़ान का केंद्र बन चुका है

लूंगी-बनियान से हॉकी की शुरुआत
1983 में तेज बहादुर सिंह ने हॉकी कोच इंद्रदेव के मार्गदर्शन में करमपुर में हॉकी खेलना शुरू किया. 1988-89 में तरवा गांव की टीम को हराने के बाद तेज बहादुर ने करमपुर में स्टेडियम बनाने का फैसला किया. 1989 में इंद्रदेव को कोचिंग के लिए बुलाया गया. यहीं से लड़कियों की हॉकी टीम भी बनी. 1994 में बनारस की टीम को हराने के बाद तेज बहादुर को यकीन हो गया कि करमपुर हॉकी का गढ़ बन सकता है

मेघबरन सिंह स्टेडियम: हॉकी की नर्सरी
आज मेघबरन सिंह स्टेडियम में 250 खिलाड़ी रोजाना अभ्यास करते हैं. चार प्रशिक्षक (दो हॉकी, एक कुश्ती, एक ताइक्वांडो) खिलाड़ियों को प्रशिक्षित करते हैं. गरीब बच्चों को मुफ्त प्रशिक्षण, ग्रेफाइट हॉकी स्टिक्स, फिटनेस ट्रेनिंग, और भोजन की व्यवस्था दी जाती है. 2016 में एस्ट्रोटर्फ की सुविधा ने प्रशिक्षण की गुणवत्ता बढ़ाई, और हॉकी इंडिया ने इसे अकादमी का दर्जा दिया. स्टेडियम का कैंपस 20 बीघा में फैला है. जिसमें 3-4 बीघा खेल का मैदान और 2-3 बीघा में टर्फ बिछा है.

ओलंपियनों और फौजियों की पाठशाला
इस स्टेडियम ने ओलंपियन ललित उपाध्याय और राजकुमार पाल जैसे सितारों को जन्म दिया. 2024-25 में यूपी सरकार ने इन खिलाड़ियों को ₹1 करोड़ और डीएसपी का पद देने की घोषणा की. स्टेडियम के संचालन की जिम्मेदारी पूर्व सांसद राधे मोहन सिंह और प्रशासनिक प्रभारी अनुशेष सिंह संभाल रहे हैं। यहां से सैकड़ों खिलाड़ी बीएसएफ, आईटीबीपी, रेलवे, पुलिस, और आर्मी में खेल कोटे के तहत नौकरी पा चुके हैं.

प्रेरणादायक पहल
नवंबर 2025 में थानाध्यक्ष ने खिलाड़ियों को मुफ्त हॉकी स्टिक्स बांटीं, जिससे बच्चों में उत्साह की लहर दौड़ गई। राधे मोहन सिंह और इंद्रदेव जैसे कोचों की मेहनत ने करमपुर को हॉकी की असली मिट्टी बनाया. तेज बहादुर सिंह का जज्बा, जो लूंगी-बनियान में शुरू हुआ. आज अंतरराष्ट्रीय स्तर पर पहचान बना चुका है. यह कहानी साबित करती है कि जुनून और मेहनत हो, तो गांव का मैदान भी सपनों का मिशन बन सकता है

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